राष्ट्रभाषा ही राष्ट्रीय एकता की होती है विशिष्ट कड़ी महात्मा गांधी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के थे पक्षधर शम्भूनाथ सहाय



किसी भी देश की अपनी पहचान होती है। देश का राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय फूल, राष्ट्रीय पशु-पक्षी, राष्ट्रीय खेल, राष्ट्रगीत एवं राष्ट्रभाषा। भारत ही एक ऐसा देश है जिसकी अभी तक कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। कहने के लिए हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है, बावजूद आजादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी इसे अब तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। राष्ट्रभाषा के बगैर देश के नागरिक अक्सर संवादहीनता के शिकार होते हैं। इस संदर्भ में महात्मा गांधी का मानना था "अपनी भाषा के बिना राष्ट्र गूंगा होता है" एक संपर्क भाषा के अभाव में किसी भी देश की राजनीतिक और सांस्कृतिक एकता न  तो संभव है और ना ही स्थाई हो सकती है। किसी भी राष्ट्र की संपर्क भाषा और राष्ट्रभाषा उस देश के सामाजिक ताने-बाने को बुनने और राष्ट्रीय एकता को अनंत समय तक बनाए रखने के लिए विशिष्ट कड़ी होती है। देश की स्वतंत्रता आंदोलन के वक्त भी राजनेताओं एवं स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत को अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ाने के लिए जनभागीदारी की जरूरत महसूस की थी। इसके लिए समूचे देश को एक सूत्र में बांधने के लिए संपर्क भाषा के रूप में हिंदी चुनी गई थी। सर्वाधिक संख्या में बोली जाने वाली भाषा सचमुच में संपर्क भाषा बन गई थी,तथा राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्रता आंदोलन को एक बल मिला था। इसी बीच सन 1918 में इंदौर में साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए महात्मा गांधी ने घोषणा की थी 'हिंदी देश की संपर्क भाषा होगी जिसे बाद में राष्ट्रभाषा माना जाएगा'। बावजूद आजादी के बाद बापू के विचार तथा घोषणा की अवहेलना कर हिंदी को अब तक उचित दर्जा नहीं दिया गया है। इसका प्रमुख कारण भाषा की राजनीति है। यहां सर्वविदित है की भारत में बहुत सी भाषाएं में प्रचलित है, परंतु वर्तमान में लगभग 47% निवासी हिंदी भाषी है, जो देश के विभिन्न राज्यों में रहते हैं। हिंदी के अलावा 17% मराठी 8% बांग्ला एवं 7% तेलुगु भाषा भाषा भाषी है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि हिंदी की तुलना में अन्य भाषा भाषियों की संख्या काफी कम है। राजनीतिक मोह माया में जकड़े हमारे नेतागण आज तक इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिला पाए हैं। इन्हें सदा यह भय सताता है कि हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने के चक्कर में कहीं सत्ता न खोना पड़ जाए। भारत सरकार ने 24 सितंबर 1949 को ही हिंदी को राजभाषा की संज्ञा से विभूषित किया था। उस वक्त कुछ विदेशी मानसिकता वालों की जिद के कारण अंग्रेजी को भी यह कह कर राजभाषा का दर्जा दिया गया था कि कुछ वर्षों के पश्चात हिंदी को पूर्णता प्रदान कर दी जाएगी। परंतु दक्षिणपंथी नेताओं के दबाव में हिंदी आज 'राष्ट्रभाषा' नहीं बन पा रही है। विकासशील देश की श्रेणी से विकसित राष्ट्र का दर्जा पाने के हकदार भारत की अभी तक अपनी राष्ट्रभाषा नहीं है। ये एक अजीब विडंबना नहीं तो और क्या है? आज हिंदी दिवस के अवसर पर  हम सभी देशवासी को राष्ट्र कल्याण के लिए हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित कराने का संकल्प लेना चाहिए। इससे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपने साकार होंगे। हिंदी को लेकर महात्मा गांधी का योगदान अतुलनीय रहा है। गुजराती होते हुए भी गांधी जी ने बड़े जतन से हिंदी सीखी थी। उन्हें देश के भ्रमण के दौरान एहसास हुआ था कि हिंदी ही ऐसी मातृभाषा है जो देश को एक सूत्र में जोड़ सकती है। इसीलिए उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात कही थी।

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