टिनी टॉट्स डे नृत्य प्रतियोगिता के ग्रुप सी का परिणाम घोषित



देवघर  : केरला एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर सोसायटी तथा ओमसत्यम इंस्टीट्यूट ऑफ फ़िल्म, ड्रामा एंड फाइन आर्ट्स के युग्म बैनर तले टिनी टॉट्स डे ऑनलाइन नृत्य प्रतियोगिता के ग्रुप सी के विजयी प्रतिभागियों की सूची की घोषणा की गई। विजयी प्रतिभागियों की सूचना जारी करते हुए केरला सोसाइटी के सचिव डॉ. जय चन्द्र राज ने जानकारी दी कि ग्रुप सी में सनराइज द्वारिका एकेडेमी की सोनम श्री को प्रथम, ज्ञान स्थली पब्लिक स्कूल, गोड्डा की अंकिता राज, संत माइकल एंग्लो विद्यालय के विशेष केशरी व भारती विद्यापीठ की अंजली कुमार बणिक को संयुक रूप से द्वितीय जबकि इसी विद्यालय के श्रुति कुमारी, केशव कुमार एवं संत माइकल की श्रुति वर्णवाल को संयुक्त रूप से तृतीय, भारती विद्यापीठ की दिशा कुमारी सिंह को चतुर्थ तथा संत कोलम्बस स्कूल के शालू कुमारी को पंचम स्थान प्राप्त हुआ। इनके अलावे बेथल मिशन स्कूल, गोड्डा की निहारिका सिंह, संत कोलम्बस की पलक झा,जसीडीह संत फ्रांसिस स्कूल के क्षितिज भास्कर, ब्राइट कैरियर स्कूल की कृति कुमारी, संत माइकल की आकृति ज्ञानप्रिय, भारती विद्यापीठ की खुशी कुमारी, बिहार की रंजना कुमारी, प्रीति कुमारी, मोहिनी कुमारी, श्वेता कुमारी तथा पश्चिम बंगाल की रूपाली मुखर्जी, हिमानी मजूमदार, प्रेरणा तालुकदार, ऋतु बनर्जी, राजस्थान की आलिया कुमारी व निरुपमा भारती को सांत्वना पुरस्कार के लिए चयनित किया गया। सभी विजयी प्रतिभागियों को 26 सितम्बर को ऑफिसर कॉलोनी स्थित संत माइकल एंग्लो विद्यालय में पुरस्कृत किया गया। 



केरल की नृत्यकला के सम्बंध में डॉ. जे.सी. राज ने कहा- कथकली मालाबार, कोचीन और त्रावणकोर के आस पास प्रचलित नृत्य शैली है। केरल की सुप्रसिद्ध शास्त्रीय रंगकला है कथकली। 17 वीं शताब्दी में कोट्टारक्करा तंपुरान ने जिस रामनाट्टम का आविष्कार किया था उसी का विकसित रूप है कथकली। यह रंगकला नृत्यनाट्य कला का सुंदरतम रूप है। भारतीय अभिनय कला की नृत्य नामक रंगकला के अंतर्गत कथकली की गणना होती है। रंगीन वेशभूषा पहने कलाकार गायकों द्वारा गाये जानेवाले कथा संदर्भों का हस्तमुद्राओं एवं नृत्य-नाट्यों द्वारा अभिनय प्रस्तुत करते हैं। इसमें कलाकार स्वयं न तो संवाद बोलता है और न ही गीत गाता है। कथकली के साहित्यिक रूप को 'आट्टक्कथा' कहते हैं। गायक गण वाद्यों के वादन के साथ आट्टक्कथाएँ गाते हैं। कलाकार उन पर अभिनय करके दिखाते हैं। कथा का विषय भारतीय पुराणों और इतिहासों से लिया जाता है। आधुनिक काल में पश्चिमी कथाओं को भी विषय रूप में स्वीकृत किया गया है। कथकली में तैय्यम, तिरा, मुडियेट्टु, पडयणि इत्यादि केरलीय अनुष्ठान कलाओं तथा कूत्तु, कूडियाट्टम, कृष्णनाट्टम आदि शास्त्रीय कलाओं का प्रभाव भी देखा जा सकता है।

कोई टिप्पणी नहीं