परिवार नियोजन को लेकर पहले काफी दुविधा थी, लेकिन आशा दीदी की पहल पर करायी नसबन्दी : उपेंद्र



बक्सर:-  परिवार नियोजन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्वास्थ्य विभाग साल में दो बार परिवार नियोजन पखवाड़ा का आयोजन कराती है। जिसमें महिलाओं की भागीदारी तो पूर्व की अपेक्षा काफी बढ़ी है। लेकिन, पुरुष अभी भी परिवार नियोजन के स्थायी साधनों को अपनाने के प्रति उदासीनता बरत रहे हैं। परिवार नियोजन को लेकर पुरुष वर्ग में अभी भी कई भ्रांतियां व्याप्त हैं। जिसके कारण से वे स्थायी साधनों को अपनाने में कतराते हैं। लेकिन, जिले के कई ऐसे भी पुरुष हैं, जिन्होंने आगे आकर नसबन्दी करायी और पुरूष वर्ग को स्थायी साधनों को अपनाने का संदेश दिया। इन्हीं में से एक हैं सदर प्रखंड स्थित बरुणा गांव के निवासी उपेंद्र कुमार यादव। जिन्होंने न केवल नसबन्दी ही करायी, बल्कि अब अपने मित्र व गांव के साथियों को भी नसबन्दी के फायदों के बारे में बताते हैं।

पत्नी की राय लेकर करायी नसबन्दी :

उपेंद्र कुमार यादव में बताया, उनकी शादी को 20 साल हो चुके हैं। उनके तीन बच्चे हैं जिनमें दो बेटे और एक बेटी शामिल है। पेशे से वो एक किसान हैं, इसलिए परिवार का भरण पोषण करने के लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ती है। उन्होंने बताया, पिछले साल दिसंबर में उनके क्षेत्र की आशा कार्यकर्ता मीरा देवी उनके घर आयी और उन्हें परिवार नियोजन औऱ स्थायी साधनों को अपनाने के लिए कहने लगीं। लेकिन, उस समय वह संकोच करने लगें। वहीं, उसके बाद दोनों पति पत्नी अक्सर परिवार नियोजन को लेकर चर्चा करने लगें। वहीं, बीते जुलाई माह में जिले में फिर से परिवार नियोजन पखवाड़ा शुरू हुआ। उसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी की राय पर स्वयं आशा दीदी से संपर्क किया और नसबन्दी करायी।

पहले होती थी झिझक, लेकिन अब देता हूं सबको नसीहत :

उपेंद्र यादव ने बताया, ग्रामीण परिवेश में पलने के कारण परिवार नियोजन पर चर्चा करने में झिझक होती थी। पहले भी मित्रों की टोली में नसबन्दी को लेकर कई भ्रांतियों के बारे में सुना था। जिसको लेकर मन में हमेशा दुविधा रहती थी। लेकिन, जब चिकित्सकों ने नसबन्दी के बारे में बताया, तो इसे अपनाने का मन बनाने लगा। दोस्तों ने मना भी किया और कई बातें गढ़ने लगें। लेकिन, सभी को नकारते हुए उन्होंने नसबन्दी करायी। जिसके बाद उन्हें किसी प्रकार की परेशानी नहीं हुई। उसके इतर अब वह पहले की अपेक्षा खुलकर अपने वैवाहिक जीवन जी रहे हैं। साथ ही, समय समय और अपने रिश्तेदारों और मित्र टोली के पुरुषों को नसबन्दी को अपनाने के लिये नसीहत दे रहे हैं।

जागरूकता से ही मानसिकता में बदलाव संभव :

परिवार नियोजन पर डीसीएम सन्तोष कुमार राय ने बताया, जागरूकता एवं जनसहभागिता से ही मानसिकता में बदलाव संभव है। शहर से लेकर पंचायत स्तर तक इसपर काम करने की जरूरत है। पुरुषों को ये समझना होगा कि परिवार को सीमित करना एवं परिवार नियोजन अकेले उनकी पत्नियों की जिम्मेदारी नहीं है। छोटा सीमित परिवार की आर्थिक, शारीरिक, सामाजिक एवं मानसिक स्थिति मजबूत होती है। दूसरी ओर स्थायी साधनों की बात करें तो महिलाओं के बंध्याकरण की अपेक्षा पुरुषों की नसबन्दी तीन गुनी सरल है। साथ ही, इसमें कोई परेशानी भी नहीं होती है।

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