वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव के बयान पर शिक्षक संघ ने डी तीखी प्रतिक्रिया



जामताड़ा वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव के बयान पर अखिल झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ के जामताड़ा इकाई ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। संथाल परगना प्रमंडल के प्रमंडलीय राज्य उपाध्यक्ष बाल्मीकि कुमार, जिला अध्यक्ष शशि शेखर सिंह, सोशल मीडिया प्रभारी पवन सिंह, जिला महासचिव महेश्वर घोष, जिला संगठन मंत्री विद्या सागर ने कहा कि झारखंड सरकार के अधिकांश मंत्री सरकारी स्कूलों में पढ़ कर आए हैं, फिर भी वह शिक्षकों को हेय दृष्टि से देखते हैं उन्होंने कहा कि कोरोना काल में पीडीएस दुकानों से लेकर अस्पताल, चेक नाका, वैक्सीनेशन में शिक्षकों ने अपनी सेवा दी है। इस तरह का बयान गुरुजनों का अपमान है। कोरोना काल में सरकारी अस्पतालों की सेवा देखी गई है, जबकि निजी अस्पतालों ने हाथ खड़े कर अपने दरवाजे बंद कर लिए थे। उसी प्रकार शिक्षक विपरीत परिस्थितियों में भी गांव, देहात हर जगह में अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। 

संघ ने कहा कि निजी और सरकारी स्कूल के बीच का अन्तर समाप्त होना चाहिए। निजी विद्यालयों में शिक्षक की भूमिका बच्चों को पढ़ाने तक सीमित है, जबकि सरकारी विद्यालयों में प्राथमिक शिक्षक को अध्यापन के अलावा शिशु गणना, पशु गणना, बी पी एल गणना, कृमि की दवाई बांटना, बैंक में खाता खुलवाना, बच्चों का जन्म पत्र बनवाना, आधार कार्ड बनवाना, जाति और आय प्रमाण पत्र बनवाना, बैंक में बच्चों के खाता का आधार सीडिंग करवाना, चावल का उठाव कर बच्चों में वितरित करना, विद्यालय में दोपहर का भोजन बनवाना, चुनाव करवाना, क्लर्क विहीन विद्यालय में शिक्षक को खुद रिपोर्ट बनाना भी अनिवार्य कर दिया गया है।

शिक्षक को केवल पढ़ाने का कार्य दिया जाना चाहिए। सरकारी शिक्षकों पर मंत्री की जी की प्रतिक्रिया हास्यास्पद है। 


जो स्वयं सरकारी संस्थानों के प्रति जवाबदेह हैं, वो खुद पल्ला झाड़कर निजीकरण को  बढ़ावा दे रहे हैं।  सैनिक विद्यालय,नवोदय विद्यालय,केंद्रीय विद्यालय,नेतरहाट विद्यालय, इंदिरा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय जैसे टॉप शैक्षिक संस्थान भी सरकारी ही है। सरकारी विद्यालयों का नेतृत्व करने वाली संस्थाएं अपने शिक्षकों पर भरोसा ही नही करती, बल्कि नित्य नए-नए प्रयोग करते रहती है। सरकारी शिक्षा को पिरामल फाउंडेशन जैसे निजी संस्थानों के पास गिरवी रख दी गई है। विद्यालय को दिए गए टैब में पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास का नाम नहीं हटा पा रही है। दिल्ली जैसे राज्यों से सीख लेकर जवाबदेही लेने के बजाय प्रश्नचिन्ह लगाना ये जिम्मेदारी से बचना है।

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