देखो अफगानिस्तान में कहर है भारी



देवघर।लागा धरती पर दाग मिटाओ रे बन्दे,बिलख रही नर और नारी भड़क उठी घर घर चिंगारी,पर आतितायों से नहीं वो डरते बाहर नारी निकल पड़े हैं,तख्ती नारों से से गूंज रहे,देखो अफगानिस्तान में

कहर है भारी।मानवता शर्मसार हुआ है,आंखों से आंसू है भारी धरा कलंकित आज हुआ है।

देख रहे हैं दुनियाँ सारी,कुछ नेताओं के बोल है बिगड़े कवि गजल के सुर है बिगड़े,अपने अपने परिचय देते काश! स्वतंत्रता को जानो,हर हर मानव के धर्म को जानो मानवता का धर्म पहचानो

दर्द मर्म को हिय से पहचानों।अमन चैन रहने वाले

दर्द बयां का हाल क्या जानो।लिखकर अल्फाजों से तुम,मानवता का रंग सजो तुम।है नारी माँ चण्डी बनकर चट चट दुश्मन को चटकाओ,धरा के लगते दाग को धोकर रब ईश को तुम पहचानो।

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