दहेज प्रथा के खिलाफ समाज को बुद्धिजीवी एवं युवाओं को एक साथ आना होगा आगे : (तारिक!)



मधुपुर 12 जुलाई : सामाजिक कार्यकर्ता सह दहेज रोकथाम कमेटी के जिला संयोजक तारिक अनवर ने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से बातचीत करते हुए कहा कि दहेज प्रथा सदियों से चलती आई एक कुरीति है जो की बदलते वक़्त के साथ और भी गहराने लगी है एक प्रकार की रस्म बना दी गयी है । ये प्रथा पहले के जमाने में केवल राजा महाराजों के वंशों तक ही सिमित था। लेकिन जैसे जैसे वक़्त गुजरता गया, इसकी जड़ें धीरे धीरे समाज के हर वर्ग में फैलने लगीं । आज के दिन हमारे देश के प्राय: हर परिवार में दहेज प्रथा की इस रस्म को निभाया जाता है। दहेज प्रथा लालच का एक उग्र-रूप है जो की   कभी कभी बड़े ही भयंकर परिणाम लाता है । दहेज प्रथा का बुरा परिणाम के बारे में सोच कर हर किसी का रूह काँपने लगता है, क्यूंकि इतिहास ने दहेज प्रथा से तड़पती दुल्हनों की एक बड़ी लिस्ट बना रखी है। ये प्रथा एक लड़की के सारे सपनो और अरमानो को चूर चूर कर देता है जो की बड़ी ही दर्दनाक परिणाम है । लगभग देश की हर कोने में ये प्रथा को आज भी निभाया जाता है, प्राय: वधु पक्ष की ओर से मजबूरी में और वर पक्ष की ओर से बेशर्मी से। ये प्रथा केवल अमीरों तक ही सिमित नहीं है, बल्कि ये अब मध्यमवर्गीयों और गरीबों का भी सरदर्द बना बैठा है।सोचने की बात है की देश में बढती तरक्की दहेज प्रथा को निगलने में कहाँ चूक जाती है? ऊँची शिक्षा और सामाजिक कार्यकर्मों के बावजूद दहेज प्रथा अपना नंगा नाच आज भी पूरी देश में कर रही है। ये प्रथा हर भारतीयों के लिए सच में एक गंभीर चर्चा बन गयी है जो की हमारे बहु बेटियों पर एक बड़ी ही मुसीबत बन गयी है । समाज का इलीट तबका जो करता है, निम्न वर्ग उसकी नकल कर खुद को बड़ा बनने की कोशिश करता है। यह बीमारी भी उच्च तबके से आई। जितनी भी घृणित प्रथाएं हैं, वे उच्च जातियों में रही हैं। बच्चियो को पैदा होते ही जिंदा गाड़ देने की प्रचलन पर रोक लगी जरूर है। अगर हम अपनी परम्पराओं पर रहें तो सम्भवतः दहेज प्रथा नहीं रुकेगी!

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