शरणार्थियों की दुर्दशा की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए विश्व शरणार्थी दिवस : डॉ. प्रदीप



देवघर: विश्व शरणार्थी दिवस दुनिया भर के शरणार्थियों के दुखों और तकलीफों को वैश्विक रूप से सामने लाने का दिन है। शरणार्थियों की शक्ति, हिम्मत और दृढ़ निश्चय को स्वीकृति देने के लिए संयुक्त राष्ट्र 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस के रूप में मनाता है। मौके पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा- प्रत्येक वर्ष विश्व शरणार्थी दिवस उन शरणार्थी पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों की शक्ति और साहस को सलाम करता है जिन्हें सतत हिंसा और अत्याचार के डर के कारण अपनी जमीन, अपना देश छोड़कर जाने को मजबूर होना पड़ा है। यह दिवस प्रत्येक वर्ष 20 जून को उन लोगों के साहस, शक्ति और संकल्प के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है, जिन्हें प्रताड़ना, संघर्ष और हिंसा की चुनौतियों के कारण अपना देश छोड़कर बाहर भागने को मजबूर होना पड़ता है। शरणार्थियों की दुर्दशा की ओर ध्यान आकर्षित करने और शरणार्थी समस्याओं को हल करने के लिए ही यह दिवस मनाया जाता है। अफ्रीकी देशों की एकता को अभिव्यक्त करने के लिए, 4 दिसंबर 2000 को संयुक्त राष्ट्र परिषद द्वारा एक प्रस्ताव पारित किया गया था। शुरुआत:-दिसंबर 2000 में संयुक्त राष्ट्र ने अफ्रीका शरणार्थी दिवस यानी 20 जून को प्रतिवर्ष विश्व शरणार्थी दिवस मनाने का निर्णय लिया। वर्ष 2001 से प्रतिवर्ष संयुक्त राष्ट्र द्वारा 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस मनाया जा रहा है। इस दिन को मनाने का मुख्य कारण लोगों में जागरुकता फैलानी है कि कोई भी इंसान अमान्य नहीं होता फिर चाहे वह किसी भी देश का हो। एकता और समंवय की भावना रखते हुए हमें सभी को मान्यता देनी चाहिए। अपने देश भारत में शरणार्थी संरक्षण के मुद्दे को संदर्भित और संबोधित करने तथा उचित कानूनी एवं संस्थागत उपायों को लागू करने की तत्काल आवश्यकता है। यह शरणार्थियों की समस्या के समाधान के लिये विशिष्ट कानून का अभाव है इसके बावजूद उनकी संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। विदेशी अधिनियम, 1946 शरणार्थियों से संबंधित एकीकृत समस्याओं के  समाधान करने में विफल रहता है। यह केंद्र सरकार को किसी भी विदेशी नागरिक को निर्वासित करने के लिये अपार शक्ति भी देता है। इसके अलावा नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 में मुसलमानों को बाहर रखा गया है और यह केवल हिंदू, ईसाई, जैन, पारसी, सिख तथा बांग्लादेश, पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान से बौद्ध प्रवासियों को नागरिकता प्रदान करता है। इसके अलावा भारत वर्ष 1951 के शरणार्थी सम्मेलन और शरणार्थी संरक्षण से संबंधित प्रमुख कानूनी दस्तावेज़ 1967 प्रोटोकॉल का पक्षकार नहीं है। इसके वर्ष 1951 के शरणार्थी सम्मेलन और 1967 प्रोटोकॉल के पक्ष में नहीं होने के बावजूद भारत में शरणार्थियों बहुत बड़ी निवास करती है। भारत में विदेशी लोगों और संस्कृति को आत्मसात करने की एक नैतिक परंपरा है। इसके अलावा भारत का संविधान भी मनुष्यों के जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बनाम स्टेट ऑफ अरुणाचल प्रदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि "सभी अधिकार नागरिकों के लिये उपलब्ध हैं जबकि विदेशी नागरिकों सहित व्यक्तियों को समानता का अधिकार और जीवन का अधिकार उपलब्ध हैं।"

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