सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-कातिल में है”..आज भी गूंजती है :डॉ. प्रदीप

 


देवघर : भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ये पंक्तियाँ सेनानियों का मशहूर नारा बनीं। 1921 में बिस्मिल अज़ीमाबादी की लिखी इन पंक्तियों को जिस व्यक्ति ने अमर बना दिया वह थे राम प्रसाद बिस्मिल। वेे एक स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ एक कवि भी थे, जिन्होंने उर्दू व हिन्दी में ‘राम,’ ‘अज्ञात,’ और ‘बिस्मिल’ उपनाम से बहुत-सी कवितायें लिखी थीं। वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक भी थे। उनका जन्म

आज ही के दिन 11 जून, 1887 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में हुआ था। मौके पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा- किशोरावस्था से ही उन्होंने भारतीयों के प्रति ब्रिटिश सरकार के क्रूर रवैये को देखा था। इससे आहात बिस्मिल का कम उम्र से ही क्रांतिकारियों की तरफ झुकाव होने लगा। जितनी आसानी से उनके हाथ कलम पकड़ते थे, उतने ही आराम से उनके हाथ पिस्तौल भी चला लेते थे। उन्होंने बंगाली क्रांतिकारी सचीन्द्र नाथ सान्याल और जादूगोपाल मुखर्जी के साथ मिलकर, हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन की स्थापना की- उत्तर भारत स्थित यह ऐसा संगठन था जिसने भारत को अंग्रेज़ी शासन से मुक्त करवाने की कसम खाई थी। इसके लिए वे अपनी देशभक्त माँ, मूलमती से पैसे उधार लेकर किताबें लिखते व प्रकाशित करते थे। ‘देशवासियों के नाम’, ‘स्वदेशी रंग’, ‘मन की लहर’, और ‘स्वाधीनता की देवी’ जैसी किताबें इसका उदाहरण हैं। इन  किताबों की बिक्री से उन्हें जो भी पैसे मिलते उससे वह पार्टी के लिए हथियार खरीदते थे। साथ ही, उनकी किताबों का उद्देश्य जन-मानस के मन में क्रांति के बीज बोना था। यह वही समय था जब उनकी मुलाक़ात अन्य क्रांतिकारियों, जैसे अशफ़ाक़ उल्ला खान, रोशन सिंह व राजेंद्र लाहिड़ी से हुई। आगे चलकर ये सभी करीबी दोस्त भी बन गए। उन्होंने ही चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह जैसे नवयुवकों को हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन से जोड़ा, जो कि बाद में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन बन गयी। बिस्मिल ने आज़ाद के उनकी कभी शांत न बैठने और नए विचारों के लिए हमेशा उत्साहित रहने वाले स्वाभाव से प्रभावित हो कर, उन्हे ‘क्विक सिल्वर’ का उपनाम दिया था। उनकी कहानी अशफ़ाक़ उल्ला खान के जिक्र के बिना अधूरी है। बिस्मिल और अशफ़ाक़, दोनों ने साथ मिलकर 1925 में काकोरी कांड को अंजाम दिया था। उन्हें महसूस हो गया था कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ एक संगठित विद्रोह करने के लिए हथियारों की ज़रूरत है। जिसके लिए पैसों के साथ-साथ प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता भी होगी। ऐसे में, इस संगठन ने अंग्रेज़ सरकार की संपत्ति को लूटने का निर्णय लिया। 9 अगस्त, 1925 की रात को जब शाहजहाँपुर से लखनऊ जाने वाली नंबर 8 डाउन ट्रेन काकोरी पहुँच रही थी, तभी अशफ़ाक़ उल्ला ने सेकंड क्लास कम्पार्टमेंट की चेन खींच दी। अचानक से ट्रेन रुक गयी और अशफ़ाक़ अपने दो अन्य साथियों, सचीन्द्र बक्शी व राजेंद्र लाहिड़ी के साथ उतर गए। यह योजना का पहला चरण था जिसे इन तीनों क्रांतिकारियों ने पूरा किया। इसके बाद ये तीनों साथी, बिस्मिल व अन्य क्रांतिकारियों से मिले और ट्रेन के गार्ड को हटा कर उन्होंने सरकारी संपत्ति लूट ली। इस घटना ने अंग्रेजी शासन को हिला कर रख दिया था और उन्होंने लूट के एक महीने के अंदर-अंदर ही बिस्मिल सहित दो दर्जनों से ज़्यादा क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया।

No comments