सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया...आज भी गूंजती है : डॉ. प्रदीप

 


देवघर : हिन्दी फिल्मों के मशहूर गीतकार प्रेम धवन का जन्म 13 जून 1923 को अम्बाला में हुआ और लाहौर में स्नातक की शिक्षा पूरी की। उनकी जयंती के अवसर पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा- कितनी ही सुरीली धुन हो, आकर्षक संगीत हो लेकिन यदि बोल गहरे नहीं हों, भाव मीठे नहीं हों, तो फिल्म संगीत मन को स्पर्श नहीं कर पाता। फिल्मोद्योग में लेखनी के चमत्कारी सूर्य-पुरुष कम नहीं हैं। प्रेम धवन ऐसा ही एक नाम है जिनकी कलम की नोक से ओजस्वी और भावुक शब्दों की सरिता बही है। प्रेम उन गीतकारों में थे जिन्होंने जितना लिखा, सार्थक लिखा। सकारात्मक लिखा और संवेदनशील होकर लिखा। साहित्य में गहरी अभिरुचि के बाद भी उनके गीतों में सरल काव्यात्मकता नजर आती है, जटिल शब्दों की भरमार नहीं। उन्होंने हिन्दी फिल्मों के लिये कई मशहूर गीत लिखे। वे ना केवल गीतकार थे, वरन उन्होंने हिन्दी फिल्मों के लिये कुछ फिल्मों में संगीत दिया, नृत्य निर्देशन किया और अभिनय तक किया। उन्होंने पं रवि शंकर से संगीत एवं पं. उदय शंकर से नृत्य की शिक्षा ली। वे आगे चलकर कांग्रेस पार्टी से भी जुड़े। शिक्षा के बाद ‘पीपुल्स थियेटर ग्रुप’ में शामिल हुए। जिसके द्वारा चार वर्षों तक नृत्य और संगीत का प्रशिक्षण लिया। उन्होंने लगभग 50 फिल्मों में नृ्त्य निर्देशन किया। फिल्म ‘नया दौर’ का उड़े जब-जब जुल्फें तेरी- प्रेम धवन के ही निर्देशन का कमाल था। फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ के गीत ‘हरियाला सावन ढोल बजाता आया’ में तो प्रेम थिरके भी हैं। जब थिएटर ग्रुप असमय ही बिखरा, तो लेखिका इस्मत चुगताई बॉम्बे टॉकीज ले गईं। जहाँ फिल्म ‘जिद्‍दी’ के लिए पहला ब्रेक मिला। गायिका लता मंगेशकर का ‘चंदा जा रे जा रे...’ पहला हिट इसी फिल्म में था। यहाँ से बॉम्बे टॉकीज ने गीत लेखन और नृत्य निर्देशन के लिए उन्हें अनुबंधित कर लिया। अनुबंध के बाद जब स्वतंत्र लेखन किया, तब संगीतकार अनिल विश्वास, सलिल चौधुरी मदनमोहन और चित्रगुप्त के साथ अच्छा तालमेल रहा। आखिरी बार प्रेम ने फिल्म ‘अप्पूराजा’ के लिए लिखा। भावुक इतने थे कि अपनी लोरी ‘तुझे सूरज कहूँ या चंदा...मेरा नाम करेगा रोशन’ को रचते हुए कई बार रो पड़े। फिल्म के किरदार को शिद्दत से महसूस करने के बाद वे लिखते थे। फिल्म ‘एक साल’ में नायिका, नायक अशोक कुमार को चाहती है। जब नायक महसूस करता है और लौटकर आता है तब वह कैंसर की मरीज होकर मृत्युशैया पर है। इसे अपने दिल की गहराई में उतारकर उन्होंने रचा- सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया, दिन में अगर चिराग जलाए तो क्या किया, ले-ले के हार फूलों का आई तो थी बहार, नजरें उठा के हमने ही देखा न एक बार...आँखों से अब ये पर्दे हटाए तो क्या किया! भारत सरकार ने उन्हें 1970 में पद्‍मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया। उनका देहांत 7 मई 2001 को हुआ।

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