मांझी मेटरिया गांव के आदिवासी परिवार उज्ववला योजना से वंचित, शौचालय भी अनुपयोगी



सारठ : अधिकारियों के उदासीन रवैये की वजह से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभ से आज भी सैंकड़ो आदिवासी परिवार वंचित हैं और उन्हें घर का चूल्हा जलाने के लिए हर दिन जंगल से जलावन की लकड़ी लाना पड़ता है। प्रखंड क्षेत्र के सीमावर्ती बिराजपुर पंचायत के आदिवासी बाहुल गांव  मांझी मेटेरिया गांव में सौ से अधिक घर आदिवासियों की है  और सभी का जीवन-यापन दैनिक मजदूरी के भरोसे चलता है। लेकिन इतने बड़े आदिवासी गांव में महज आठ परिवार को ही उज्ववला योजना से गैस सिलेंडर मिला है और शेष परिवारों के लिए गैस चूल्हा पर खाना बनाना आज भी एक सपना बन कर रह गया है। नतीजा इन घरों की आदिवासी महिलाएं रोज सुबह घर का काम करके चूल्हे के जलावन के लिए घर से पांच किलोमीटर दूर सारठ के बेहरा व अन्य जंगल लकड़ी काटने जाती है। वहीं लकड़ी की बोझ माथे पर लेकर घर पहुंचती है और इस दौरान रास्ते मे कई जगह पेड़ की छाव में बैठकर अपनी थकान भी दूर करती है। शनिवार को भी मांझी मेटेरिया गांव की ये आदिवासी महिलायें रुपूमुनी हेम्ब्रम, सुकरमुनी मुर्मू, बहामुनी मरांडी, सुकुमुनी हेम्ब्रम, निलमुनी मुर्मू आदि तपती धूप में माथे पर लकड़ी का बोझा लेकर आ रही थी। महिलाओं से पूछने पर बताया कि उनलोगों को गैस सिलेंडर नहीं मिला है, इसलिए जलावन की लकड़ी से ही खाना बनाती है। बताया कि इस दौरान कई तरह का डर भी रहता है। लेकिन कोई दूसरा उपाय भी नहीं है। सरकारी योजनायों का लाभ हम गरीबों को नसीब नहीं होता है। ग्रामीणों ने बताया की गांव में शौचालय निर्माण के नाम पर भी भारी गड़बड़ी की गई है। एक भी शौचालय उपयोगी नहीं है। सरकार की इतनी बडीं राशि शौचालय निर्माण पर खर्च होने के बाद भी लोग खुले में शौच जाने को मजबूर है।

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