राहुल सांकृत्यायन लेखक, इतिहासविद, एशियाई नवजागरण के प्रवर्तक-नायक थे : डॉ. प्रदीप



देवघर : राहुल सांकृत्यायन महान लेखक, इतिहासविद, पुरातत्ववेत्ता, त्रिपिटकाचार्य के साथ-साथ एशियाई नवजागरण के प्रवर्तक-नायक थे। काशी के बौद्धिक समाज ने उन्हें 'महापंडित' के अलंकार से सम्मानित किया था। मौके पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के केन्द्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा- राहुल सांकृत्यायन का असली नाम केदार पांडेय था, पर दुनिया उन्हें महापंडित राहुल सांकृत्यायन के नाम से जानती है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पन्दहा ग्राम में 9 अप्रैल, 1893 को हुआ था। बचपन में ही माता कुलवन्ती देवी तथा पिता गोवर्धन पांडेय की असामयिक मृत्यु के चलते वह ननिहाल में पले बढ़े। उनकी शुरुआती शिक्षा उर्दू में हुई। पन्द्रह साल की उम्र में उर्दू माध्यम से मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण कर वह आजमगढ़ से काशी आ गए। उन्होंने विश्व के अनेक देशों की यात्रा की। कुछ आलोचकों के मुताबिक वे 36 भाषाओँ के ज्ञाता थे। बौद्ध मत का अध्ययन करने के लिए उन्होंने चीन, जापान, श्रीलंका और तिब्बत आदि की कष्टपूर्ण यात्रा की और लंबे समय तक इन देशों के सुदूर इलाकों में प्रवास किया। उनका मानना था कि अंग्रेजों की शह पर पल रहे सामंतवाद और पूंजीवाद के गठजोड़ को तोड़े बिना किसानों की दशा नहीं सुधरेगी। 1921 में वह महात्मा गांधी के साथ जुड़ गए। इस बीच उन्होंने अपने व्याख्यानों, लेखों और पुस्तकों से पूरी दुनिया को भारत से बाहर बिखरे बौद्ध साहित्य से परिचित कराया। वे 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए और जेल चले गए।उन्होंने कहानी, उपन्यास, यात्रा वर्णन, जीवनी, संस्मरण, विज्ञान, इतिहास, राजनीति, दर्शन जैसे विषयों पर विभिन्न भाषाओं में लगभग 155 ग्रंथ लिखे। अपने जीवनकाल में 50 हजार से अधिक पन्ने लिखने वाले राहुल सांकृत्यायन ने अपने घुमक्कड़ी जीवन में कितने लाख किलोमीटर की यात्रा की, कितने हजार किलोमीटर वे पैदल ही चले, इसका किसी को पता नहीं है। वोल्गा से गंगा लिखने से पहले उन्होंने भारत के 8 हजार वर्षों के इतिहास को अपनी आंखों से देखा, फिर दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया। उनका हृदय बहुत बड़ा था। वे व्यक्ति में दोष की बजाय गुण देखने पर बल देते थे। सन1961 में उनकी स्मृति खो गई। इसी दशा में 14 अप्रैल, 1963 को उनका देहांत हो गया।

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