कविता की सृजनात्मक महिमा को सम्मान देना हमारा कर्तव्य है : डॉ. प्रदीप



देवघर : स्थानीय योगमाया मानवोत्थान ट्रस्ट के बैनर तले विश्व कविता दिवस के अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में ट्रस्ट के राष्ट्रीय सचिव डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा- संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन ने वर्ष 1999 में 30 वें सत्र के दौरान कवियों और कविता की सृजनात्मक महिमा को सम्मान देने के लिए यह दिवस मनाने का निर्णय लेते हुए इसकी घोषणा की थी। तब से हर साल 21 मार्च को विश्व कविता दिवस मनाया जाता है। इस दिवस के अवसर पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और साहित्य अकादमी की ओर से सबद-विश्व कविता उत्सव का आयोजन किया जाता है। इस दिवस मनाने का उद्देश्य यही है कि विश्व में कविताओं के लेखन, पठन, प्रकाशन और शिक्षण के लिए नए लेखकों को प्रोत्साहित किया जाए। इसके जरिए छोटे प्रकाशकों के उस प्रयास को भी प्रोत्साहित किया जाता है जिनका प्रकाशन कविता से संबंधित है। जब यूनेस्को ने इस दिन की घोषणा की थी तब उसने कहा था कि क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कविता आंदोलन को यह एक तरह की पहचान मिली है। मैथिलीशरण गुप्त की नर हो, न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ काम करो, जग में रह कर कुछ नाम करो, यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो, समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो, कुछ तो उपयुक्त करो तन को, नर हो, न निराश करो मन को; सुभद्राकुमारी चौहान की स्वतंत्र प्यारे स्वदेश आ, स्वागत करती हूँ तेरा, तुझे देखकर आज हो रहा, दूना प्रमुदित मन मेरा, आ, उस बालक के समान, जो है गुरुता का अधिकारी। आ, उस युवक-वीर सा जिसको, विपदाएं ही हैं प्यारी ; अटल बिहारी वाजपेयी की टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते, सत्य का संघर्ष सत्ता से, न्याय लड़ता निरंकुशता से, अंधेरे ने दी चुनौती है, किरण अंतिम अस्त होती है,दीप निष्ठा का लिये निष्कंप, वज्र टूटे या उठे भूकंप, यह बराबर का नहीं है युद्ध ; गुलजार की दूसरो की जय से पहले, ख़ुद को जय करें, भेद भाव अपने दिल से साफ कर सकें, दोस्तों से भूल हो तो माफ़ कर सके, झूठ से बचे रहें, सच का दम भरें, दूसरो की जय से पहले ख़ुद को जय करें, हमको मन की शक्ति देना... और अनगिनत कवियों की कवितायेँ आज भी हमारी प्रेरणास्रोत है।

No comments