फणीश्वर नाथ 'रेणु' जन्मशती पर विवेकानंद संस्थान का वर्षभर का कार्यक्रम



देवघर : भारतीय लेखक और कार्यकर्ता पद्मश्री फणीश्वर नाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान ने वर्ष भर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करने का निर्णय लिया है। इसके अंतर्गत विद्यार्थियों में चित्रांकन, निबंध, भाषण व अन्य कई प्रतियोगिताएँ रखी गई है। वर्ष 2021 का अंतर्राष्ट्रीय सम्मान समारोह भी रेणु को समर्पित होगा। देश-विदेश के साहित्यकार भी 'पद्मश्री फणीश्वर नाथ रेणु स्मृति पुरस्कार' से नवाजे जाएँगे। साथ ही देश-विदेश के सौ साहित्यकार एवं साहित्यप्रेमियों को उनकी तस्वीर समर्पित की जाएगी। मौके पर विवेकानंद संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा- फणीश्वर नाथ 'रेणु' एक हिन्दी भाषा के साहित्यकार थेजिनका जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के अररिया जिले में फॉरबिसगंज के पास औराही हिंगना गाँव में हुआ था। उनकी शिक्षा भारत और नेपाल में हुई। प्रारंभिक शिक्षा फारबिसगंज तथा अररिया में पूरी करने के बाद उन्होंने मैट्रिक नेपाल के विराटनगर के विराटनगर आदर्श विद्यालय से कोईराला परिवार में रहकर की। उन्होने इन्टरमीडिएट काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1942 में की जिसके बाद वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। बाद में 1950 में उन्होने नेपाली क्रांतिकारी आन्दोलन में भी हिस्सा लिया जिसके परिणामस्वरुप नेपाल में जनतंत्र की स्थापना हुई। पटना विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के साथ छात्र संघर्ष समिति में सक्रिय रूप से भाग लिया और जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति में अहम भूमिका निभाई। 1952-53 के समय वे भीषण रूप से रोगग्रस्त रहे थे जिसके बाद लेखन की ओर उनका झुकाव हुआ। उनके इस काल की झलक उनकी कहानी तबे एकला चलो रे में मिलती है। उन्होने हिन्दी में आंचलिक कथा की नींव रखी। इनकी लेखन-शैली वर्णणात्मक थी जिसमें पात्र के प्रत्येक मनोवैज्ञानिक सोच का विवरण लुभावने तरीके से किया होता था। उनकी कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने आंचलिक जीवन के हर धुन, हर गंध, हर लय, हर ताल, हर सुर, हर सुंदरता और हर कुरूपता को शब्दों में बांधने की सफल कोशिश की है। उनकी भाषा-शैली में एक जादुई सा असर है जो पाठकों को अपने साथ बांध कर रखता है। रेणु एक अद्भुत किस्सागो थे और उनकी रचनाएँ पढते हुए लगता है मानों कोई कहानी सुना रहा हो। ग्राम्य जीवन के लोकगीतों का उन्होंने अपने कथा साहित्य में बड़ा ही सर्जनात्मक प्रयोग किया है। उन्हें जितनी ख्याति हिंदी साहित्य में अपने उपन्यास मैला आँचल से मिली, उसकी मिसाल मिलना दुर्लभ है। इस उपन्यास के प्रकाशन ने उन्हें रातो-रात हिंदी के एक बड़े कथाकार के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। इसके अलावे उनके द्वारा लिखित परती परिकथा, जूलूस, दीर्घतपा, कितने चौराहे, पलटू बाबू रोड, एक आदिम रात्रि की महक, ठुमरी, अग्निखोर, अच्छे आदमी इत्यादि भी आज भी पाठकों को काफी पसंद है। उनकी मृत्यु 11 अप्रैल, 1977 को हुई।

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