कठपुतली-खेल के माध्यम सामाजिक मुद्ददों को उजागर किया जाता है : डॉ. प्रदीप



देवघर : स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के बैनर तले विश्व कठपुतली दिवस के अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा- प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है। कठपुतली का खेल अत्यंत प्राचीन नाटकीय खेल है, जो समस्त सभ्य संसार में प्रशांत महासागर के पश्चिमी तट से पूर्वी तट तक-व्यापक रूप प्रचलित रहा है। यह खेल गुड़ियों अथवा पुतलियों द्वारा खेला जाता है। गुड़ियों के नर मादा रूपों द्वारा जीवन के अनेक प्रसंगों की, विभिन्न विधियों से, इसमें अभिव्यक्ति की जाती है और जीवन को नाटकीय विधि से मंच पर प्रस्तुत किया जाता है। कठपुतलियाँ या तो लकड़ी की होती हैं या पेरिस-प्लास्टर की या काग़ज़ की लुग्दी की। उसके शरीर के भाग इस प्रकार जोड़े जाते हैं कि उनसे बँधी डोर खींचने पर वे अलग-अलग हिल सकें। अपने देश भारत में पारंपरिक पुतली नाटकों की कथावस्तु में पौराणिक साहित्य, लोककथाएँ और किवदंतियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। पहले अमर सिंह राठौड़, पृथ्वीराज, हीर-रांझा, लैला-मजनूं और शीरीं-फ़रहाद की कथाएँ ही कठपुतली खेल में दिखाई जाती थीं। कुछ समय पहले तक लोग कठपुतली कला को केवल मनोरंजन का एक साधन मानते थे परंतु अब यह कला करियर का रूप लेती जा रही है। अब यह मनमोहक कला भारत के साथ-साथ विदेशों में भी लोकप्रिय होती जा रही है। कठपुतली का खेल दिखाने वाले को कठपुतली कलाकार या पपेटियर कहते हैं। वर्तमान में कठपुतली शो टेलीविजन एवं फिल्मों में काफ़ी लोकप्रिय हो रहे हैं जैसे एनडीटीवी का पपेट शो 'गुस्ताखी माफ' तथा स्टार वन के लाफ्टर शो का रेंचो आदि। कठपुतली का नाम सुनते ही जेहन में सबसे पहले राजस्थान का नाम आता है। माना जाता है कि कठपुतली लोक कला का इतिहास लगभग 1500 साल पुराना है। यह लोक कला राजस्थान के नागौर तथा मारवाड़ जिले के भट आदिवासी जाति के लोगों का पारंपरिक व्यवसाय भी है। राजस्थान के गांवों में कोई भी मेला, धार्मिक त्योहार या सामाजिक मेलजोल कठपुतली नाच के बिना अधूरा है। राजस्थान में कठपुतली नाच न केवल मनोरंजन का स्रोत है, बल्कि इस लोक कला के जरिये नैतिक और सामाजिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार भी होता है तथा सामाजिक मुद्ददों और कुरीतियों को उजागर किया जाता है। राजस्थान की ये लोक कला भारत और पूरे विश्व भर में प्रसिद्ध है। कठपुतलियों को तार के माध्यम से उंगलियों पर नचाया जाता है। खाट के माध्यम से एक मंच तैयार किया जाता है, जिस पर तख्त लगाया जाता है। कठपुतली को डोरी के जरिये बांधा जाता है, जो ऊपर से गुजरती है और उसका एक छोर कठपुतली कलाकारों के हाथ में होता है। कठपुतली नाच की शुरुआत ढोलक की थाप से होती है और आमतौर पर महिला मंडली की ओर से कथा के माध्यम से सुनाई जाती है। कठपुतली नाच राजस्थान में अलग-अलग विषयों पर आधारित होता है। इनमें नागौर के अमरसिंह राठौर का संवाद काफी लोकप्रिय है। खूबसूरती से रंगी गई कठपुतलियां आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, उड़ीसा और केरल में काफी लोकप्रिय हैं। केरल के ‘तोलपवकूथु’ और आंध्र प्रदेश के ‘थोलु बोमलता’ में ज्यादातर पौराणिक कथाएं ही दर्शाई जाती हैं, जबकि कर्नाटक के ‘तोगलु गोम्बे अट्टा’ में धार्मिक विषय और चरित्र भी शामिल किए जाते हैं। उत्तर प्रदेश में इस कला का खूब प्रचलन रहा है. पहले कठपुतलियों का इस्तेमाल यहीं शुरू हुआ था। शुरू में इनका इस्तेमाल प्राचीनकाल के राजा महाराजाओं की कथाओं, धार्मिक, पौराणिक व्याख्यानों और राजनीतिक व्यंग्यों को प्रस्तुत करने के लिए किया जाता था। कठपुतलियां ओडिशा का ‘साखी कुंदेई’, असम का ‘पुतला नाच’, महाराष्ट्र का ‘मालासूत्री बहुली’ और कर्नाटक की ‘गोम्बेयेट्टा’ धागे से नचाई जाने वाली कठपुतलियों के रूप हैं।

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