देवघर के रंगमंच कलाकारों को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलानी है : डॉ. प्रदीप



देवघर  : स्थानीय ओमसत्यम इंस्टीट्यूट ऑफ फ़िल्म, ड्रामा एंड फाइन आर्ट्स के निदेशक, राजीव गांधी कला मंदिर, पोंडा, गोआ में बिरजू महाराज के करकमलों से 'नाट्य भारती' एवं कोलकाता में 'नाट्य नन्दन' पुरस्कार विजेता डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस के अवसर पर कहा- अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस की स्थापना 1961 में नेशनल थियेट्रिकल इंस्टीट्यूट द्वारा की गई थी। तब से यह प्रति वर्ष 27 मार्च को विश्वभर में फैले नेशनल थियेट्रिकल इंस्टीट्यूट के विभिन्न केंद्रों में तो मनाया ही जाता है, रंगमंच से संबंधित अनेक संस्थाओं और समूहों द्वारा भी इस दिन को विशेष दिवस के रूप में आयोजित किया जाता है। इस दिवस का एक महत्त्वपूर्ण आयोजन अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संदेश है, जो विश्व के किसी जाने माने रंगकर्मी द्वारा रंगमंच तथा शांति की संस्कृति विषय पर उसके विचारों को व्यक्त करता है। इस अवसर पर किसी एक देश के रंगकर्मी द्वारा  विश्व रंगमंच दिवस के लिए आधिकारिक सन्देश जारी किया जाता है। 1962 में फ्रांस के जीन काक्टे पहला अन्तर्राष्ट्रीय सन्देश देने वाले कलाकार थे. वही 2002 में, भारत के गिरीश कर्नाड, जो एक मशहूर रंगकर्मी रह चुके हैं, को भी यह उपलब्धि हासिल हुई। बदलते समय के साथ भारत में भी रंगमंच का चलन कम हो गया है। माना जाता है कि भारत के छत्तीसगढ़ में रामगढ़ के पहाड़ पर एक प्राचीनतम नाट्यशाला मौजूद है जो महाकवि कालिदास द्वारा निर्मित है। भारत में हर जगह मल्टीप्लेक्स और दूसरे  साधनों के बावजूद भी, यहाँ के कॉलेज, यूनिवर्सिटीज में आज भी सामाजिक मुद्दों पर नुक्कड़ नाटक, रंगमंच पर नाटक काफी प्रचलन में हैं। नाट्यशास्त्र में सर्वभारतीय स्तर पर स्वर्णपदक प्राप्त डॉ. प्रदीप ने आगे कहा- देवघर की धरती पर भी अनेकों नाट्यकार अपनी पहचान सम्पूर्ण भारत में बना चुके हैं। इस कड़ी में सबसे पहले दो नाम आता है- स्व. प्रशांत कुमार चटर्जी जिन्होंने बैंड मास्टर व परवाना में अपनी अदाकारी से आज भी अमर हैं, दूसरे स्व. विश्वनाथ चटर्जी उर्फ बिशु दा जिन्होंने महेश नाटक में गफूर मियाँ की अदाकारी से आज भी देवघर के नाट्यप्रेमियों में जीवित हैं। फिर रोहिणी के रामजीवन गुप्ता, अर्जुन श्रीवास्तव, सतसंग के सीकू दा, सत्येन्द्र नाथ नन्दन, फाल्गुनी साहा ने भी अपनी पहचान पूरे भारत में बनाने में कामयाबी हासिल की। सन 2008 में कोर्निक स्कूल ऑफ आर्ट द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय नाट्य प्रतियोगिता में पूजारिणी नृत्यनाटिका में दासी की भूमिका में स्वागता सेन ने भी अपनी अदाकारी से खूब तालियाँ बटोरी थी। डॉ. सिंंह देव ने अपने इंस्टीट्यूट में पुनः नाट्यकला को जीवित रखने के लिए नाटको का मंचन करवाने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि देवघर के नाट्यकारों को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलानी है।

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