सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि गौरैया का गौरव लौटाएं : डॉ. प्रदीप



देवघर : स्थानीय साइंस एंड मैथेमेटिक्स डेवलपमेंट आर्गेनाईजेशन के बैनर तले आयोजित विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर आर्गेनाईजेशन के राष्ट्रीय सचिव डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा - विश्व गौरैया दिवस प्रत्येक वर्ष '20 मार्च' को मनाया जाता है। यह दिवस पूरी दुनिया में गौरैया पक्षी के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए मनाया जाता है। घरों को अपनी चीं-चीं से चहकाने वाली गौरैया अब दिखाई नहीं देती। इस छोटे आकार वाले खूबसूरत पक्षी का कभी इंसान के घरों में बसेरा हुआ करता था और बच्चे बचपन से इसे देखते बड़े हुआ करते थे। अब स्थिति बदल गई है। गौरैया के अस्तित्व पर छाए संकट के बादलों ने इसकी संख्या काफ़ी कम कर दी है और कहीं-कहीं तो अब यह बिल्कुल दिखाई नहीं देती। विश्व गौरैया दिवस पहली बार वर्ष 2010 में मनाया गया था। यह दिवस प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को पूरी दुनिया में गौरैया पक्षी के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए मनाया जाता है। एक-दो दशक पहले हमारे घर-आंगन में फुदकने वाली गौरैया आज विलुप्ति के कगार पर है। इस नन्हें से परिंदे को बचाने के लिए ही इस दिवस को मनाने का संकल्प लिया गया है। भारत में गौरैया की संख्या लगातार घटती ही जा रही है। कुछ वर्षों पहले आसानी से दिख जाने वाला यह पक्षी अब तेज़ी से विलुप्त हो रहा है। छत पे दाना पानी जो मिल जाएगा, एक परिंदा मीठे गीत सुनाएगा। मगर, ऐसा सुनने को नहीं मिला रहा है, क्योंकि कंक्रीट के जंगल और मोबाइल टावर से निकलने वाली तरंगें उनके अस्तित्व के लिए खतरा बन गई हैं। अगर इनके बचाव को लेकर हम नहीं चेते तो निकट भविष्य में गौरैया का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। आने वाली पीढ़ियां केवल गौरैया को किताबों में पढ़ेगी।  हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि गौरैया का गौरव लौटाएं, ताकि फिर आंगन व छत पर गौरैया फुदकती नजर आए। गौरैया सामान्यत: घरों में घोंसले बनाती हैं। मसलन, छप्पर, झरोखा, बंद पंखा, छत की लकड़ी, खपरैल को अपना आशियाना बनाती हैं। ये घने पेड़ बबूल, कनेर, नींबू, अमरूद, अनार आदि पेड़ों को पसंद करती हैं। इस झुंड में रहना पसंद है। इसकी लंबाई 14 से 16 सेंटीमीटर होती है, जबकि इसका वजन 25 से 32 ग्राम तक होता है। यह विलुप्त होने के कगार पर है। हममें से कुछ लोग उसके संरक्षण का प्रयास कर रहे हैं। यह एक छोटी प्रजाति की चिड़िया है। यह एशिया, अमेरिका, यूरोप के कई देशों में पाई जाती है। कंक्रीट जंगल बनने से, प्राकृतिक जंगल घटने से, मोबाइल टावर की तरंगों से भारत ही नहीं, बल्कि विदेश में भी गौरैैया की तादाद में गिरावट आ रही है। इसकी कई प्रजातियां पाई जाती हैं। इसकी संख्या कितनी है, इसकी गणना अभी तक नहीं हो पाई है। जिस अनुपात में पहले यह दिखती थीं, उस अनुपात से नहीं दिख रही हैं। मोबाइल टावर की तरंगें इसके प्रजनन में प्रभाव डालती हैं, जैसे गिद्ध व हुदहुद के साथ हुआ है। अगर ऐसी स्थिति रही है तो निकट भविष्य में गौरैया को देख पाना मुश्किल होगा।

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