देवघर के साहित्यप्रेमियों ने अपने विचारों से जानकी वल्लभ को दी श्रद्धांजलि



देवघर  : सचमुच हमारा देश कवि, साहित्यकार, संगीतकार और महापुरुषों की जन्मभूमि है। इन्हीं रत्नों में से श्री जानकी वल्लभ शास्त्री भी एक है जो मरकर भी अमर हैं। उनका जन्म 5 फरवरी, 1916 में बिहार के मेगरा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री रामानुग्रह शर्मा थे जिनका देहांत उनके बचपन के समय में ही हो गया था। उन्हें पशुओं का पालन करना बहुत ही पसंद था। उनके यहां दर्जनों, गाय, सांड, बछड़े तथा बिल्ली और कुत्ते थे। पशुओं से उन्हें इतना प्रेम था कि गाय क्या, बछड़ों को भी भेजते नहीं थे और उनके मरने पर उन्हें अपनी आवास के परिसर में दफना देते थे।  उनका दाना पानी जुटाने में उनका परेशान रहना स्वाभाविक था। क्योंकि उनके पास ज्यादा धन नहीं था। उनकी पत्नी का नाम छाया देवी है। आज सम्पूर्ण देश उनकी जयंती मना रही है, वहीं अपने शहर के साहित्यप्रेमियों ने भी स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के बैनर तले उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

मौके पर प्रगतिशील लेखक संघ, देवघर इकाई के अध्यक्ष सह काव्यगोष्ठी के संचालक प्रो. रामनन्दन सिंह ने कहा- श्री जानकी वल्लभ शास्त्री छायावादोत्तर काल के विख्यात प्रसिद्ध कवि, लेखक और आलोचक थे। उन्हे उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘भारत भारती पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया था। उनका का काव्य संसार बहुत ही विविध और व्यापक है। शुरुआत में उन्होंने संस्कृत में कविताएं लिखी थी। फिर महाकवि निराला की प्रेरणा से हिंदी में आ गए। 

अमृतवर्षी मानव रत्न - काव्यसंग्रह के रचनाकार, विवेकानंद संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा - हंस बलाका गद्य महाकाव्य की इनकी रचना हिन्दी जगत् की एक अमूल्य निधि है। छायावादोत्तर काल में प्रकाशित पत्र-साहित्य में व्यक्तिगत पत्रों के स्वतंत्र संकलन के अंतर्गत शास्त्री द्वारा संपादित निराला के पत्र  उल्लेखनीय है। इनकी प्रमुख कृतियां संस्कृत में- काकली, बंदीमंदिरम, लीलापद्‌मम्‌, हिन्दी में रूप-अरूप, कानन, अपर्णा, साहित्यदर्शन, गाथा, तीर-तरंग, शिप्रा, अवन्तिका, मेघगीत, चिंताधारा, प्राच्यसाहित्य, त्रयी, पाषाणी, तमसा, एक किरण सौ झाइयां, स्मृति के वातायन, मन की बात, हंस बलाका, राधा आदि प्रमुख हैं।

देवघर जिला कला एवं संस्कृति परिषद के सचिव रामसेवक सिंह गुंजन ने कहा- उन्होंने 16 साल की आयु  में ही लिखना आरंभ किया था। उनकी पहली रचना गोविन्दगानम्‌ है। रूप-अरूप और तीन-तरंग के गीतों के बाद कालन, अपर्णा, लीलाकमल और बांसों का झुरमुट-  उनके चार कथा संग्रह प्रकाशित हुए। उनके द्वारा लिखित चार समीक्षात्मक ग्रंथ- साहित्यदर्शन, चिंताधारा, त्रयी और प्राच्य साहित्य हिन्दी में भावात्मक समीक्षा के सर्जनात्मक रूप के कारण समादृत हुआ।

रामेश्वर लाल सर्राफ उच्च विद्यालय के वरीय शिक्षक डॉ. विजय शंकर ने कहा- जानकी वल्लभ शास्त्री का पहला गीत ‘किसने बांसुरी बजाई’ काफी लोकप्रिय हुआ। वे भारतेंदु और श्रीधर पाठक द्वारा प्रवर्तित और विकसित उस स्वच्छंद धारा के आखिरी कवि थे, जो छायावादी अतिशय लाक्षणिकता और भावात्मक रहस्यात्मकता से मुक्त थी। उन्होंने कहानियाँ, काव्य-नाटक, आत्मकथा, संस्मरण, उपन्यास और आलोचना भी लिखी है। 

अपराजिता लघु उपन्यास की लेखिका, मातृ मंदिर बालिका उच्च विद्यालय की पूर्व प्रधानाध्यापिका शोभना सिंह ने कहा - जानकी वल्लभ शास्त्री ने 11 वर्ष की वय में ही उन्होंने 1927 में बिहार-उड़ीसा की सरकारी संस्कृत परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। 16 वर्ष की आयु में शास्त्री की उपाधि  प्राप्त करने के बाद वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय चले गए। वे वहां 1932 से 1938 तक रहे। उनकी विधिवत् शिक्षा-दीक्षा तो संस्कृत में ही हुई थी, लेकिन अपनी मेहनत से उन्होंने अंग्रेज़ी और बांग्ला का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया।

भारत चालीसा, एक संस्मरण व अन्य कई पुस्तकों के लेखक जालेश्वर ठाकुर शौकीन ने कहा - 1945-50 तक इनके चार गीति काव्य प्रकाशित हुए- शिप्रा, अवन्तिका, मेघगीत और संगम। कथाकाव्य गाथा का प्रकाशन सामाजिक दृष्टिकोण से क्रांतिकारी है। इन्होंने एक महाकाव्य राधा की रचना की जो सन्‌ 1971 में प्रकाशित हुई। छोटी उम्र में ही अपने पिता के देहांत कारण वे आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे थे। आर्थिक समस्याओं के निवारण के लिए उन्होंने बीच-बीच में नौकरी भी की थी। उनकी मृत्यु 7 अप्रैल, 2011 को हुई। अन्य साहित्यप्रेमियों ने भी उनके कृतित्व पर प्रकाश डाला।

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