स्वामी विवेकानंद निबंध प्रतियोगिता के विजयी प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया




 देवघर  स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान तथा योगमाया मानवोत्थान ट्रस्ट के युग्म बैनर तले पिछले दिनडाक द्वारा राष्ट्रीय स्तर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था जिसमें सम्पूर्ण देश से हजारों प्रतिभागियों ने अपनी भागीदारी निभाई थी। आज देवघर के विजयी प्रतिभागियों को विवेकानंद संस्थान के केन्द्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव, प्रगतिशील लेखक संघ, देवघर इकाई के अध्यक्ष प्रो. रामनन्दन सिंह, लच्छीरामका चैरिटेबल ट्रस्ट के संस्थापक न्यासी ई. यमुना प्रसाद लच्छीरामका, सैमुएल फूटे स्मृति पुरस्कार विजेता डॉ. नीतू अग्रवाल व डॉल्फिन डांस एकैडमी के निदेशक अजीत केशरी के करकमलों से बम्पास टाउन स्थित डॉल्फिन सभागार में पुरस्कृत किया गया। प्राप्त जानकारी के अनुसार संत अल्फोंनसा स्कूल के वैभव कुमार, गीता देवी डीएवी पब्लिक स्कूल की आराध्या प्रिया, आयुषी संतोषी, ब्राइट कैरियर स्कूल के सूरज कुमार, गौरव कुमार, विनीता कुमारी, शिवांशु राज, साक्षी कुमारी, युक्ता देव, शिक्षिका आरती पांडेय, भारती विद्यापीठ की कृतिका कुमारी, माउंट लिटेरा जी स्कूल की हिमानी पाण्डेय, देवसंघ नेशनल स्कूल की अस्मिता हालदार, देवघर महाविद्यालय की प्रगति सिन्हा, पुष्पांजलि देव, सतसंग महाविद्यालय की वितास्था केशरी, माउंट कार्मेल पब्लिक स्कूल की खुशी सिन्हा, राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, तिरुपति की छात्रा आयुषी अन्या, बिलासी निवासी सोनल कुमारी, विलियम्स टाउन निवासी सहस्त्रांशु सूर्यवंशी व अन्य को पुरस्कृत किया गया। मौके पर डॉ. नीतू अग्रवाल ने स्वामी विवेकानंद के सन्दर्भ में कहा- स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय बताता है कि उन्तालीस वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे। ई. यमुना प्रसाद लच्छीरामका ने कहा- गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था- यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं। प्रो. रामनन्दन सिंह ने कहा- वे केवल सन्त ही नहीं, एक महान देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी भी थे। डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा- स्वामीजी भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा के स्रोत बने। उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। उनके कथन-"‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।" अजीत केशरी ने कहा- उन्नीसवीं सदी के आखिरी वर्षोँ में विवेकानन्द लगभग सशस्त्र या हिंसक क्रान्ति के जरिये भी देश को आजाद करना चाहते थे। शिक्षिका आरती पाण्डेय ने कहा- विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे। छात्रा आयुषी अन्या ने कहा- स्वामीजी के अनुसार पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता, एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान, ध्यान से ही हम इन्द्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते है। वितास्था केशरी ने कहा- स्वामीजी कहते थे, जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। अस्मिता हालदार ने कहा - स्वामीजी कहते थे, जिस समय जिस काम के लिए प्रतिज्ञा करो, ठीक उसी समय पर उसे करना ही चाहिये, नहीं तो लोगो का विश्वास उठ जाता है। सोनल कुमारी ने कहा- शिकागो की धर्ममहासभा में स्वामीजी ने पुरोहितवाद, ब्राह्मणवाद, धार्मिक कर्मकाण्ड और रूढ़ियों की खिल्ली भी उड़ायी और लगभग आक्रमणकारी भाषा में ऐसी विसंगतियों के खिलाफ युद्ध भी किया। आराध्या प्रिया ने कहा- स्वामी विवेकानंद का विचार था कि सामाजिक स्वतंत्रता तथा सामाजिक समानता के बीच समन्वय बिठाकर ही सामाजिक उत्थान के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

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