आशापूर्णा देवी यथार्थवादी, सहज और संतुलित थी : डॉ. प्रदीप



देवघर भारत से बांग्ला भाषा की कवयित्री और उपन्यासकार आशापूर्णा देवी की जयंती के अवसर पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा - भारत के महान उपन्यासकार आशापूर्णा देवी का जन्म 8 जनवरी, 1909 को पोटोलडांगा, कोलकाता में हुआ था। उन्होंने 13 वर्ष की अवस्था से लेखन प्रारम्भ किया। गृहस्थ जीवन के सारे दायित्व को निभाते हुए उन्होंने लगभग दो सौ कृतियाँ लिखीं। उनके सृजन में नारी जीवन के विभिन्न पक्ष, पारिवारिक जीवन की समस्यायें, समाज की कुंठा और लिप्सा अत्यंत पैनेपन के साथ उजागर हुई हैं। उनकी कृतियों में नारी का वयक्ति-स्वातन्त्र्य और उसकी महिमा नई दीप्ति के साथ मुखरित हुई है। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं स्वर्णलता, प्रथम प्रतिश्रुति, प्रेम और प्रयोजन, बकुलकथा, गाछे पाता नील, जल, आगुन आदि आज भी चर्चित है। उनकी कर्मभूमि पश्चिमी बंगाल थी। उनका पहला कहानी-संकलन "जल और जामुन" 1940 में यहीं से प्रकाशित हुआ था। उनकी कहानियाँ पात्र, संवाद या घटनाओं का जमघट नहीं हैं, परंतु जीवन की किसी अनकही व्याख्या को व्यंजित करती हैं। उनकी अपनी एक विशिष्ट शैली थी। चरित्रों का रेखांकन और उनके मनोभावों को व्यक्त करते समय वे यथार्थवादिता को बनाये रखती थीं। सच को सामने लाना उनका उद्देश्य रहता था। उनका लेखन आशावादी दृष्टिकोण लिए हुए था। उनके उपन्यास मुख्यतः नारी केन्द्रित रहे हैं। उनके उपन्यासों में जहाँ नारी मनोविज्ञान की सूक्ष्म अभिव्यक्ति और नारी के स्वभाव उसके दर्प, दंभ, द्वंद और उसकी दासता का बखूबी चित्रण किया हुआ है वहीँ उनकी कथाओं में पारिवारिक प्रेम संबंधों की उत्कृष्टता दृष्टिगोचर होती है। उनकी कथाओं में तीन प्रमुख विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं – वक्तव्य प्रधान, समस्या प्रधान और आवेग प्रधान। कथा का विकास, चरित्रों का रेखाकंन, पात्रों के मनोभावों से अवगत कराना, सबमें वह यथार्थवादिता को बनाए रखते हुए अपनी आशामयी दृष्‍टि को अभिव्‍यक्‍ति देती हैं। वे यथार्थवादी, सहज और संतुलित थी। उनकी निरीक्षण शक्ति गहन और पैनी थी और विचारों में गंभीरता थी। वे मानवप्रेमी थी। वे विद्रोहिणी थी।  उन्होने अपने 87 वर्ष के दीर्घकाल में 100 से भी अधिक औपन्यासिक कृतियों की रचना की। उन्हें वर्ष 195 में लीला पुरस्कार, 1964 में टैगोर पुरस्‍कार, 1966 में भूटान मोहिनी दासी स्वर्ण पदक व बूँद मेमोरियल पुरस्कार, 1976 में पद्मश्री एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार, 1988 में हरनाथ घोष पदक, 1993 में जगतरानी स्वर्ण पदक से अलंकृत एवं विभूषित किया गया। 13 जुलाई, 1995 को उनकी मृत्यु हुई। परन्तु आज भी वे साहित्य जगत में अमर हैं।

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