महाश्वेता देवी ने अपने जीवन में बेहतरीन साहित्य का सृजन किया : डॉ. प्रदीप



देवघर  :  भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखिका महाश्वेता देवी की 95वीं जयंती के अवसर पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के केन्द्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा- महाश्वेता देवी का जन्म 14 जनवरी, 1926 को मनीष घटक एवं धारिणी देवी की कन्या के रूप में हुआ था। उनकी स्कूली शिक्षा ढाका में शुरू हुई लेकिन देश के विभाजन के बाद वह सपरिवार पश्चिमी बंगाल आ गईं । वहाँ उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय के शान्ति निकेतन से अंग्रेजी में बी.ए. ऑनर्स की परीक्षा पास की । एम.ए. अंग्रेजी के लिए वह कलकत्ता, यूनिवर्सिटी में आईं और वहीं से परीक्षा उत्तीर्ण की । वर्ष 1964 में उन्होंने विजयगढ़ कॉलेज में अध्यापन शुरू किया। अध्यापन के साथ उन्होंने पत्रकारिता, रचनात्मक लेखन तथा आदिवासियों के जीवन का अध्ययन शुरू किया। उन्होंन बिहार, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का जीवन उनके बीच रहकर तथा उनमें घुल-मिलकर समझा। उन्होंने महसूस किया कि उनके जीवन का स्तर मनुष्यों जैसा उपलब्ध नहीं है। वहाँ न शिक्षा है, न स्वास्थ्य सेवा, न ही कोई सड़क रास्ता है, न आमदनी का कोई जरिया। उन्होंने इन अनुभवों को अपने लेखन के माध्यम से आम जनता तक पहुँचाया। अपने जीवनकाल में ज्ञानपीठ, पद्मभूषण, साहित्य अकादमी एवं अन्य सम्माननीय पुरस्कार से सम्मानित महाश्वेता देवी ने अपने जीवन में कई अलग-अलग लेकिन महत्वपूर्ण किरदार निभाए। उन्होंने पत्रकारिता से लेकर लेखन, साहित्य, समाज सेवा एवं अन्य कई समाज हित से जुड़े किरदारों को बखूबी निभाया। उन्होंने अपने जीवन में न केवल बेहतरीन साहित्य का सृजन किया बल्कि समाज सेवा के विभिन्न पहलुओं को भी समर्पण के साथ जिया तथा आदिवासियों के हित में भी अपना अमूल्य सहयोग दिया। उन्होंने कम उम्र में लेखन का शुरू किया और विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए लघु कथाओं का महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी पहली उपन्यास, "नाती", 1957 में अपनी कृतियों में प्रकाशित किया गया था ‘झाँसी की रानी’ उनकी प्रथम गद्य रचना है जो 1956 में प्रकाशन में आया। इस पुस्तक को उन्होंने कलकत्ता में बैठकर नहीं बल्कि सागर, जबलपुर, पुणे, इंदौर, ललितपुर के जंगलों, झाँसी ग्वालियर, कालपी में घटित तमाम घटनाओं यानी 1857-58 में इतिहास के मंच पर जो हुआ उस सबके साथ-साथ चलते हुए लिखा। अपनी नायिका के अलावा लेखिका ने क्रांति के तमाम अग्रदूतों और यहाँ तक कि अंग्रेज अफसर तक के साथ न्याय करने का प्रयास किया है। उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों में 'नटी', 'मातृछवि ', 'अग्निगर्भ' 'जंगल के दावेदार' और '1084 की मां', माहेश्वर, ग्राम बांग्ला हैं। पिछले चालीस वर्षों में,उनकी छोटी-छोटी कहानियों के बीस संग्रह प्रकाशित किये जा चुके हैं और सौ उपन्यासों के करीब प्रकाशित हो चुकी है। अपने उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार' में वे समाज में व्याप्त मानवीय शोषण और उसके विरुद्ध उबलते विद्रोह को उम्दा तरीके से रखांकित करती हैं। ‘अरण्येर अधिकार’ में उस बिरसा मुंडा की कथा है, जिसने सदी के मोड़ पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध जनजातीय विद्रोह का बिगुल बजाया। मुंडा जनजाति में समानता, न्याय और आजादी के आंदोलन का सूत्रपात बिरसा ने अंग्रेज़ों के खिलाफ किया था। ‘अरण्येर अधिकार’ आदिवासियों के सशक्त विद्रोह की महागाथा है जो मानवीय मूल्यों से सराबोर है। उनकी  मृत्यु 28 जुलाई, 2016 को हुई।

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