काली पूजा के अवसर पर उमड़ी भीड़,शिव महिमा पुराण में भी गड़शिमुला दक्षिणा काली माँ का है वर्णन।



कुंडहीत(जामताड़ा) कुंडहीत नाला विधानसभा क्षेत्र के कुंडहित प्रखंड मुख्यालय से 10किमी दूर  बंगाल सीमा पर स्तित अम्बा पंचायत के गड़शिमुला दक्षिणा काली मंदिर निरंतर ही वहां आने वाले भक्तों की मनोकामनाएं तो पूरी करती ही है,साथ ही माँ दक्षिणा काली का यह जागृत स्थल अपने ऐतिहासिक व पौराणिक महत्वों और पृष्ठभूमि की बदौलत झारखंड के साथ बिहार-बंगाल व अन्य राज्यों में दूर-दूर तक बहुचर्चित है।इस स्थल की प्रसिद्धि का आकलन तब होता है,जब मंगलवार ओर शनिवार को यहाँ होने वाली विशेष पूजा में बड़ी तादाद में आसपास के अलावा दूर दराज से श्रद्धालु पहुंचते है।प्रत्येक उत्सव के अवसर पर यहां अनगिनत पशुओं की बलि दान दिया जाता है।

शिव महिमा पुराण में भी गड़शिमुला दक्षिणा काली का वर्णन मिलता है।जब इस मंदिर के इतिहास के बारे में इस मंदिर के पुजारी स्वाधीन चक्रवर्ती से बात किये तो उन्होंने बताया कि गड़शिमुला दक्षिणा काली  मंदिर के पारंपरिक व पौराणिक दृश्टिकोण से शिव महिमा पुराण में भी वर्णन है।

लगभग 1000 वर्ष पूर्व यह क्षेत्र झाड़ी एवं जंगल से परिपूर्ण था।बंगाल के वर्धमान जिले में संताल परगना के देवघर तक का क्षेत्र घने जंगलों से आच्छादित था।इस जंगल मे कापालिक नामक जाती के लोग निवास करते थे।कापालिक लोग गड़शिमुला स्थित अपने गुप्त अड्डे पर माँ काली की विधिवत पूजार्चना करते थे।उस समय मे भक्तो द्वारा यहाँ पशुओं की वली देकर अपनी मनोकामना पूरी करने की परंपरा शुरू हुआ,जो आज भी अनबरत जारी हैं।

मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल मे साधकों द्वारा इस स्थल को सिद्धिस्थल के रूप में उपयोग करते थे।

वहीं तथ्यों के अनुसार शिपाहि विद्रोह के महानायक तात्या टोपे ने यहां आकर पूजा-साधना कर सिद्धि लाभ करने की जानकारी मिलती हैं।कालांतर में यह क्षेत्र राजनगर के राजा नरसिंह राय बहादुर के अधीन चला।राजा का कोई संतान नही था।इस मंदिर में राजा रानी ने उपासना कर माँ दक्षिणा काली की कृपा से रानी ने एक पुत्री को जन्म दिया,ओर उसकी नाम श्यमला रखा,और ये स्थल राजा नरसिंह राय के गढ़ था,इसलिए इस जगह का नाम गड़शिमुला रख दिया।राजा ने स्थल क्षेत्र में एक सैन्य शिविर स्थापित की थी।इस शिविर में माल जाती के 1500 सैनिक रहते थे।राजा की पुत्री श्यामला इस शिविर की अधिनायक थी।बताया जाता है कि राजा प्रतिदिन अपनी शिद्धि के बल पर गंगा स्नान कर इस जागृत स्थल पर पूजार्चना करते थे।राजा इसी स्थान पर हर मुकद्दमे की सुनवाई करते थे और अपराधियों को शूली पर चढ़ाया जाता था।आज के दौर में झारखंड,बिहार तथा पश्चिम बंगाल के अधिकांश जिलों से अच्छी खासी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं।

2012 में राज्य सरकार ने इस स्थल को पर्यटन स्थल घोषित किया।जब इस स्थल के विकाश के बारे में पुजारी स्वाधीन चक्रवर्ती से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि हाल ही में झारखंड सरकार द्वारा इस मंदिर को धार्मिक स्थल के रूप में मान्यता देकर आधार भूत सुबिधाओं से जोड़ने के लिए प्रयास शुरू किया गया है।

जबकि ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व वाले इस स्थल के समुचित विकाश के लिए अभी यहाँ और भी बहुत कुछ करने की आवश्यकयता है

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