असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है नवरात्र



गोड्डा :- इस वर्ष  शारदीय नवरात्रि  कोरोना संक्रमण के बीच शुरू हुए, शारदीय नवरात्र के पहले दिन शैलपुत्री देवी की पूजा की गई। देवी मां के जयकारे गूंजते रहे। मंदिर घरों में कलश स्थापना कर लोगों ने विधि विधान से दुर्गा माता की पूजा आराधना की गई। इस वर्ष पिछले वर्षों की तरह भीड़ नहीं उमड़ी। प्रशासन के द्वारा मंदिर में सोशल डिस्टेंसिंग और कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करते हुए पूजन करने का निर्देश दिया गया है। नवरात्र में रोजाना काफी संख्या में श्रद्धालु मां दुर्गा के विविध स्वरूपों के दर्शन और पूजा अर्चना के लिए मंदिर जाते हैं। इस वर्ष श्रद्धालु मंदिरों में मूर्ति नहीं छू सकेंगे। पंडित नितेश कुमार मिश्रा ने बताया कि भारतीय संस्कृति में देवी को ऊर्जा का स्त्रोत माना गया है। अपने अंदर की ऊर्जा को जागृत करना ही देवी उपासना का मुख्य प्रयोजन है। नवरात्रि मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है। इसलिए हजारों वर्षों से लोग नवरात्रि मना रहे हैं।

नवरात्र का त्यौहार मनाने के पीछे बहुत सी रोचक कथाएं प्रचलित हैं। पंडित नितेश मिश्रा ने बताया कि देवी ने कई असुरों का अंत करने के लिए बार-बार अवतार लिए हैं। ऐसी कथा आती है कि दैत्य गुरु शुक्राचार्य के कहने पर असुरों ने घोर तप कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और वर मांगा कि उन्हें कोई पुरुष, जानवर और शस्त्र ना मार सके। वरदान मिलते ही असुर अत्याचार करने लगे। सब देवताओं की रक्षा के लिए ब्रह्मा जी ने वरदान का भेद खोलते हुए बताया कि असुरों का अंत अब स्त्री शक्ति ही कर सकती है। ब्रह्मा जी के आदेश पर देवताओं ने 9 दिनों तक मां पार्वती को प्रसन्न किया और उनसे असुरों के संघार का वचन लिया। असुरों के संघार के लिए देवी ने रौद्र रूप धारण कर असुरों का अंत किया।

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