जवाहरलाल नेहरू का वो शायर दोस्त जो कहता था कि नेहरू को आधी अंग्रेजी आती है आज उनकी जयंती है

ब्यूरो रिपोर्ट।फ़िराक़ गोरखपुरी के नाम से शायरी करने वाले रघुपाती सहाय उर्दू के प्रतिष्ठित शायर थे।


 उनका जन्म 28 अगस्त, 1896 को गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था, पिता मुंशी गोरख प्रसाद वकालत करते थे और अच्छे शायरों में भी उनका शुमार था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा पूर्ण कर वे डिप्टी कलेक्टर के पद  पर नियुक्त हुए।


स्वतंत्रता संग्राम का दौर था, गांधी से फ़िराक़ इतने प्रभावित हुए की 1921 में अफ़सरी छोड़ दी और संग्राम में कूद पड़े, असहयोग आंदोलन में गिरफ़्तार हो कर जेल काटनी पड़ी। अपने पिता के साथ 'आनंद भवन' जाने आने के क्रम में वे नेहरू जी के करीबी दोस्त बन गए। पिता जी के गुजर जाने के बाद घर की जिम्मेदारियाँ आ गयीं तो कांग्रेस कार्यालय में नौकरी की, पर तुरंत ही छोड़ दी, फिर पैसों के अभाव में गोरखपुर वाला अपना घर बेचकर बहनों की शादी की, आगरा चले गए और सेंट स्टीफ़ेंस में पढ़ाने लगे। 

मन नहीं रमा तो लौट कर इलाहाबाद आ गए और वि.वि में अंग्रेज़ी के प्रवक्ता हो गए। साहित्य से उन्हें बेहद लगाव था, स्वभाव से अलमस्त, परंतु विद्वान थे, अंग्रेज़ी, फ़ारसी, अरबी, उर्दू पर ज़बरदस्त नियंत्रण था उनका। जब उर्दू शायरी करने लगे तो, वो शायरी जो या तो रुमानियत या दार्शनिकता के लिए जानी जाती थी, को रोज़मर्रा की ज़िंदगी तक खींच ले आए। उनकी जिंदगी, उनकी शायरी और उनके गुफ्तगू करने के अंदाज से उर्दू वालों को बड़ी राहत और ज़ेहनी ताक़त मिलती थी। 'फ़िराक़' बड़ी बेबाकी, जुर्रत और निष्पक्षता के साथ उर्दू की हिमायत में गैर उर्दू भाषियों के बीच इतनी तर्कपूर्ण तकरीर करते थे कि वे लोग भी 'फ़िराक़' की जहानत के साथ-साथ उर्दू जबान की कशिश के कायल हो जाते 


उन्होंने रूह-ए-कायनात, नग्म-ए-साज, ग़ज़लिस्तान, शेरिस्तान, शबनमिस्तान, रूप, धरती की करवट जैसी दर्जनों सर्वोत्तम रचनाएँ कीं। 1968 में भारत सरकार ने उनके उल्लेखनीय कार्य के लिए पद्मभूषण से उन्हें सम्मनित किया, फिर 1969 में उनकी लिखी 'ग़ुल-ए-नग़मा' के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया, इस पुरस्कार के साथ मिली एक लाख की सम्मान राशि को उन्होंने आयोजकों को लौटाते हुए कहा की 'मैं यह राशि कहाँ सम्भालूँगा, इसे आप ज़रूरतमंद विद्यार्थीयों पर खर्च कर दीजिएगा'। 1970 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा अकादमी की सदस्यता से नवाज़ा गया।


 उनके सम्मान में डाक-तार विभाग ने डाक टिकट जारी किया। जीवन के अंतिम दिनों में वे काफ़ी अकेले हो गए थे, 3 मार्च 1982 को उनका देहांत हो गया, बक़ौल फ़िराक़ 'ऐ मौत आके ख़ामोश कर गई तू, सदियों दिलों के अन्दर हम गूंजते रहेंगे'। आज उनकी जयंती पर उन्हें शत् शत् नमन।


अभिजीत आनंद

स्वतंत्र पत्रकार

    स्तंभकार

महाविद्या द्वारा सम्मानित

  सह राष्ट्रीय खिलाड़ी

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