रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी उपाधि क्यों त्याग दी थी? | आनंद




रविन्द्र नाथ टैगोर, साहित्‍य के 'नोबेल पुरस्‍कार' से सम्मानित, विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार और दार्शनिक थे, जिन्‍हें गुरूदेव कहकर भी पुकारा जाता है। उनका जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ था। उनके पिता उन्हें बैरिस्टर बनाना चाहते थे पर रविंद्र की इसमें बिलकुल रुचि नहीं थी। उनकी रुचि साहित्य में थी और पहली कविता उन्होंने 8 वर्ष की आयु में ही लिख दी, और अपने जीवन काल में लगभग 2230 गीतों की रचना की थी। 1901 में उन्होंने शांतिनिकेतन में एक प्रायोगिक विद्यालय की स्थापना की जो आगे चल कर 1921 में विश्वभारती विश्वविद्यालय बना। उनकी रचना 'गीतांजलि' के लिए उन्हें 1913 में 'नोबेल पुरस्कार' से नवाज़ा गया, किसी भी एशीयन को नवाज़ा गया यह पहला पुरस्कार था। 1915 में अंग्रेजों ने उन्हें 'नाइटहुड' की उपाधि से अलंकृत किया, जिसे उन्होंने 1919 के जलीयाँवाला काण्ड की वजह से त्याग दिया। टैगोर ने ही गान्धीजी को सबसे पहली बार महात्मा कहकर पुकारा था। वे एकमात्र कवि हैं जिनकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं, भारत का राष्ट्रगान “जन गण मन” और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान “आमार सोनार”। कल्पना की शक्ति ने उनकी कला को जो विचित्रता प्रदान की उसकी व्याख्या शब्दों में संभव नहीं है, भारत के इस बहुमुखी साहित्यकार कर 7 अगस्त 1941 को कलकत्ता में निधन हो गया। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि।
अभिजीत आनंद
     स्तंभकार
सह राष्ट्रीय खिलाड़ी

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