राष्ट्रकवि मैथिलशरण गुप्त की रचनाएं अविस्मरणीय अभिजीत आनंद


ब्यूरो रिपोर्ट।मैथिलीशरण गुप्त, भारत के राष्ट्रकवि थे। हिन्दी की खड़ी बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण और प्रसिद्ध कवि को साहित्य जगत में प्यार से 'दद्दा' कह कर सम्बोधित किया जाता था। 3 अगस्त 1886 को इनका जन्म उत्तर प्रदेश में झाँसी के निकट चिरगाँव में हुआ था। उनके पिता, रामचरण 'कनकलता' उप नाम से कविता किया करते थे, अतैव गुप्त जी को कवित्व प्रतिभा पैतृक देन में मिली थी, और वे बाल्यकाल में ही काव्य रचना करने लगे। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद ज़्यादा पढ़ाई में इनका मन नहीं रमा, तो इन्होंने घर पर ही संस्कृत, हिन्दी तथा बांग्ला साहित्य का व्यापक अध्ययन किया । 
 बार इनके लिखे दोहे, छप्पये कलकत्ता से प्रकाशित 'वैश्योपकारक' पत्र में प्रकाशित हुए। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की छत्रछाया में इनकी काव्य प्रतिभा पल्लवित व पुष्पित हुई। वे लोकसंग्रही कवि थे और अपने युग की समस्याओं के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील थे, और भारत की स्वतंत्रता के प्रति समर्पित थे। 1909 की उनकी रचनाएं 'जयद्रथ वध' और फिर 'भारत भारती' में कवि का क्रान्तिकारी स्वर सुनाई पड़ता है। 59 वर्षों में कविवर मैथिली शरण गुप्त ने गद्य, पद्य, नाटक, मौलिक तथा अनूदित सब मिलाकर, हिन्दी को लगभग 74 रचनाएँ प्रदान की हैं, जिनमें दो महाकाव्य, 20 खंड काव्य, 17 गीतिकाव्य, चार नाटक और गीतिनाट्य हैं। 1936 में गांधी जी ने उन्हें मैथिली काव्य–मान ग्रन्थ भेंट करते हुए राष्ट्रकवि का सम्बोधन दिया। आगरा विश्वविद्यालय तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने इन्हें डी. लिट. की उपाधि से विभूषित किया। भारत सरकार ने 1952 में राज्यसभा की सदस्यता प्रदान की और 1954 में उन्हें 'पद्मभूषण' अलंकार से सम्मानित किया गया। उनका देहावसान 12 दिसंबर, 1964 को चिरगांव में हुआ। इनके स्वर्गवास से हिन्दी साहित्य को जो क्षति पहुंची, उसकी पूर्ति संभव नहीं है। आज उनकी जयंती पर उन्हें कोटि कोटि नमन।

 अभिजीत आनंद
     स्तंभकार
    लेखक/कवि
 महाविद्या द्वारा सम्मानित
    सह राष्ट्रीय खिलाड़ी

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