तंत्र विद्या का संबंध उत्पत्ति, विनाश ,साधना ,अलौकिक शक्तियों से होते हुए भी इसका मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना:- विजय सिन्हा





तंत्र विद्या का संबंध उत्पत्ति, विनाश ,साधना ,अलौकिक शक्तियों से होते हुए भी इसका मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना:- विजय सिन्हा

 देवघर तंत्र-विद्या का सम्बन्ध उत्पत्ति, विनाश, साधना, अलौकिक शक्तियों से होते हुए भी इसका मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना हैं।  मोक्ष ही सर्वोत्तम तथा सर्वोच्च प्राप्य पद हैं। मोक्ष यानी जन्म तथा मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर अपने आत्म-तत्व को ब्रह्म में विलीन करना मोक्ष कहलाता हैं; जीव ८४ लाख योनि प्राप्त करने के पश्चात मानव देह धारण करता हैं। तंत्रों के अनुसार मानव शरीर ३ करोड़ नाड़ियों से बना हैं तथा इनमें प्रमुख इड़ा, पिंगला तथा सुषुम्ना हैं तथा यह मानव देह के अंदर रीड की हड्डी में विद्यमान हैं। तंत्र-विद्या द्वारा कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर, इन्हीं तीन नाड़ियों द्वारा ब्रह्म-रंध तक लाया जाता हैं, यह प्रक्रिया पूर्ण योग-मग्न कहलाता हैं तथा अपने अंदर ऐसी शक्तियों को स्थापित करता हैं जिससे व्यक्ति अपने इच्छा अनुसार हर कार्य कर सकता हैं।
तंत्र द्वैत के भाव को समाप्त करता है, जिससे मनुष्य, सरल हो जाता है और चेतना के स्तर पर विकसित होता है।  चित्त के चित्रण को हटाना और चित्त में कौल धर्मानुसार चित्रित करना ही ही साधना कहलाता है।चित्त का रुप ही चिद्रुप कहलाता है।सत्य का मतलब होता है; सत्+तत् ॥ सत्य। इसलिए सत्यम् शिवम् सुंदरम् शब्दों को जीवनीय आधार माना गया है। तंत्र साधना का प्रारंभ होता है।
सत्यम्
सत यानि मैं तत यानि ईष्ट, अर्थात ईष्ट तक जाना।सत का ज्ञान हो इसके लिए साधक को सत को सत के अंग में देखना चाहिए।सत के अंग को सत+अंग सत्संग करना चाहिए।सत का ज्ञान होने पर साधक संत हो जाता है।सत+अन्त॥संत जो साधक अपने आप को अन्त तत अर्थात ईष्टप्राप्ति करने को उत्सुक होता है,ईष्ट हेतू अपना उत्सर्ग करने हेतु तत्पर रहते हैं ।अपने आप को सत्य के प्राप्ती हेतू बलिदान देने को तैयार है।
शिवम्
तब उसे शिव का सानिध्य मिलना शुरू होता है। शिव साधक को द्विभुज गुरु रूप में प्राप्त होते हैं।
सुंदरम
गुरु ईष्ट देवता के सुंदर सर्वशक्तिमान ईष्ट बीज को कानों को माध्यम बनाकर हृदय में स्थित कर देते हैं।
साधक को बीज में उपस्थित रूप को अपने चितरुप में धारण कर लेता है।चितरुप ही चिद्रुप कहलाता है।चित में ईष्टरूप जितना स्पष्ट और स्थायी होता जाता है साधक के चितभ्रांतियां दुर होने लगता है। बार-बार साधक भ्रमित भी होता रहता है।
चित की वृत्ति हमेशा चंचल रहती है।उस चंचलता के कारण साधक को साधना करते हुए भी अनेक विषयों पर अनेक रूपों में दिखेंगे लेकिन साधक अन्य विचारों और अन्य चित्रों में जाने से अपने आप को रोककर चिद्रुप को ईष्टरूप में स्विकारते हैं। जब साधक विचारों को आत्मसात करने लगता है,अन्य रूप में आशक्ती आने लगता है उसे ही चितभ्रम कहते हैं। लेकिन चित्त वृत्तियों का विरोध करने में सक्षम होना ही साधना कहलाता है। इसलिए जरूरी है कि साधक गुरु आज्ञा पालन करते हुए अपने बुद्धि और तर्क का त्याग करते हुए चित में ईष्टरूप का चिंतन करें।चित्त को जबतक बुद्धि संचालित करते हैं तब-तब भ्रातियां आती रहती है। 
इसलिए कहा गया है योग: चित्तवृत्तिनिरोध:।
चित्तवृत्ति निरोध नहीं करने पर सच+चित्त+आनंद का
सत्यम शिवम सुंदरम का विरोध होना साधक के अंदर शुरू हो जाता है। अतः साधक को सावधानीपूर्वक चित्त वृत्तियों पर अंकुश लगाने का प्रयास करना चाहिए।चित को ईष्ट समर्पित करते ही साधक की उग्रता सरलता में बदलने लगता है।
सरल होने पर इष्ट के संबंध सहजता से बन जाता है। तंत्र का उपयोग इष्ट प्राप्ति की लिए सद्भावना के साथ करना चाहिए।
दही मंथन करने पर घी दिख जाता है। ठीक इसी प्रकार से साधक को  ईष्ट बीज रुपी मथनी से चित्त मंथन करके आनंद को ईष्टको प्रकट करना है। दूध में जैसे मक्खन का अनुभव नहीं होता वैसे ही ईष्ट का जो कि सर्वत्र है, का अनुभव नहीं होता।
तंत्र शब्द का अर्थ तन यानी शरीर से जुड़ा है। ऐसी सिद्धियां जिन्हें पाने के लिए पहले तन को साधना पड़े या ऐसी सिद्धियां जिन्हें शरीर की साधना से पाया जाए, उसे तंत्र कहते हैं। तंत्र एक तरह से शरीर की साधना है। एक ऐसी साधना प्रणाली, जिसमें केंद्र शरीर होता है।
बीजमंत्र : देवता का विग्रह मंत्र के रूप में उपस्थित रहता हैं। देवताओं के तीन रूप होते हैं १. परा २. सूक्ष्म ३. स्थूल, सामान्यतः मनुष्य सर्वप्रथम स्थूल रूप की उपासना करते हैं तथा इसके सहारे वे सूक्ष्म रूप तक पहुँच जाते हैं।
 तंत्र विद्या के माध्‍यम से व्यक्ति अपनी आत्मशक्ति का विकास करके कई तरह की शक्तियों से संपन्न हो सकता है। तंत्र विज्ञान- जिसमें यंत्रों के स्थान पर मानव अंतराल में रहने वाली विद्युत शक्ति को कुछ ऐसी विशेषता संपन्न बनाया जाता है जिससे प्रकृति से सूक्ष्म परमाणु उसी स्थिति में परिणित हो जाते हैं जिसमें कि मनुष्य चाहता है।
 तंत्र में आदिशक्ति कहा गया है। यह परंपरागत पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है। तंत्र शास्त्र के अनुसार नारी इसी आदिशक्ति का साकार प्रतिरूप है। षटचक्र भेदन व तंत्र साधना में स्त्री की उपस्थिति स्वीकार्य है, क्योंकि साधना स्थूल शरीर द्वारा न होकर सूक्ष्म शरीर द्वारा ही संभव है।
आत्म-शुद्धि और आध्यात्मिक विकास पर पूर्ण ध्यान केन्द्रित करना तंत्र शास्त्र का अभिन्न अंग है, जिसमें सूक्ष्म तत्वमीमांसा और उन्नत योगाभ्यास शामिल हैं।
तंत्र व्यावहार में आने वाला एक आध्यात्मिक ज्ञान है और आध्यात्मिक उत्थान की ओर उन्मुख करने के लिए इसमें तत्त्व-सिद्धांतों (प्रकृति के मौलिक निर्माण इकाई का विज्ञान) और मंत्र (देवता सामान नाद का विज्ञान) का प्रयोग होता है। विशेष रूप से, तंत्र का अंतर्निहित ढांचा कुछ असमानताओं को छोड़कर मुख्यतः वेदांत और सांख्य पर आधारित है। तंत्र “ब्राह्मण या शिव की परम सत्य एवं जगत में उनकी शक्ति की अभिव्यक्ति के योग की पहचान है। तंत्र वैदिक कर्मकाण्ड(अनुष्ठान) और दर्शन के बीच का सेतु है और कभी-कभी वेदों के एक भाग के रूप में माना जाता है और इसे पांचवा वेद भी कहा जाता है। तंत्र में गुरु और ईष्ट ही प्रधान होते हैं।
जय महाकाल जय औघड़ तारा

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