कच्चे धागे पक्के रिश्ते "येन वद्धो बली राजा, दानवेंद्रो महाबला: तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे! मा चल ,मा चल











हमारा देश भारत, त्योहारों, संस्कारो और उत्सवों का देश है। हर दिन अद्भुत अनोखा सा अनुभव होता है और हर पल एक खुशी लेकर आता है। प्रत्येक जाति के अपने-अपने उत्सव और त्योहार होते हैं। उनके मूल में भिन्न-भिन्न कारण होते हैं। उन्हें मनाने के ढंग भी पृथक्-पृथक् हो सकते हैं, लेकिन एक-दूसरे के त्योहारों के प्रति सबके मन में श्रद्धा होती है तथा उनमें लोग सहर्ष सम्मिलित भी होते हैं। इस प्रकार ये त्योहार जाति विशेष की संस्कृति तथा राष्ट्र की चेतना के भी अंग होते हैं। भारत में मनाए जाने वाले त्योहारों में कुछ राष्ट्रीय त्योहार हैं, कुछ का महत्त्व धार्मिक दृष्टि से है तथा कुछ त्योहार प्रांतीय स्तर पर भी मनाए जाते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर मनाए जाने वाले त्योहारों में से ही एक त्योहार रक्षाबंधन है।


रक्षाबंधन का पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। श्रावण की पूर्णिमा को मनाए जाने के कारण इसे ‘श्रावणी पर्व’ के नाम से भी जाना जाता है।

प्राचीन समय में आश्रमों में रहने वाले ऋषिगण श्रावण मास में स्वाध्याय और यज्ञादि करते रहते थे। पूर्णिमा के दिन मासयज्ञ की पूर्णाहुति और तर्पणकर्म होता था। साथ ही यज्ञोपवीत भी धारण किया जाता था। यज्ञ के अंत में रक्षासूत्र बाँधा जाता था। गुरुजन शिक्षासत्र का आरंभ करते थे और आशीर्वाद के रूप में पीले रंग का रक्षासूत्र अभिमंत्रित करके बाँधते थे। इसीलिए इस त्योहार को श्रावणी’, ‘ऋषितर्पण’, ‘उपाकर्म’ तथा ‘रक्षाबंधन’ के नाम से भी पुकारते हैं।

‘राखी’ शब्द संस्कृत के ‘रक्षा’ शब्द से बना हुआ है। ‘बंधन’ का तात्पर्य ‘बाँधने’ से है। इस प्रकार रक्षाबंधन वह सूत्र है, जिसका संबंध रक्षा के लिए तत्पर रहने से है। प्रचलित कथाएँ-रक्षाबंधन पर्व के साथ अनेक पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाएँ जुड़ी हैं। पौराणिक कथा के अनुसार देव-दानवों के बीच होने वाले युद्धों में दानवों का पक्ष भारी होता जा रहा था, इससे देवता परेशान हो गए, तभी युद्ध के लिए प्रस्थान करते समय शची ने अपने पति इंद्र के मंगल और विजय की कामना से उनके हाथ में रक्षासूत्र बाँधा। इस युद्ध में इंद्र विजयी हुए और यही माना जाने लगा कि इंद्र की विजय उस रक्षासूत्र के कारण हुई। इस कथा में यह बात उल्लेखनीय है कि उस समय पुरुष के हाथ में स्त्री भी राखी बाँधती थी।


 ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार सिकंदर की रक्षाभावना से प्रेरित एक यूनानी युवती ने महाराजा पुरु को रक्षासूत्र बाँधा था और महाराजा पुरु ने अवसर पाकर भी सिकंदर का वध नहीं किया था। एक अन्य ऐतिहासिक प्रसंग के अनुसार, महाराणा संग्राम सिंह की मृत्यु के बाद जब गुजरात के सुलतान बहादुरशाह ने मेवाड़ पर आक्रमण कर उसे चारों ओर से घेर लिया, तब मेवाड़ की महारानी कर्मवती ने दिल्ली के बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर अपनी और मेवाड़ की रक्षा का मौन निमंत्रण भेजा था। बादशाह ने राखी के पवित्र महत्त्व को समझा और मेवाड़ के लिए तुरंत प्रस्थान किया। हुमायूँ ने मेवाड़ को पराजित होने से बचाकर और उदय सिंह को मेवाड़ का राजा बनाकर अपना कर्तव्य पूरा किया।
वर्तमान स्वरूप– वर्तमान समय में यह त्योहार भाई बहन के प्यार का द्योतक है। बहनें अपनी पूजा की थाली में चावल, कुमकुम, दही आदि रखकर राखी का पावन सूत्र बाँधती हैं। अब प्राचीन काल की तरह युद्धों का भय नहीं है, अतएव सुख और शांति की दशा में भाई भी बहन को यथाशक्ति धन या उपहार देता है, एवं बहन इसकी अभिलाषा रखती हैं|भारत के कई प्रदेशों में ब्राह्मण अपने यजमान को सूत्र बाँधते हैं और उनसे दक्षिणा आदि प्राप्त करते हैं।

“येन बद्धो बलि राजा,
दानवेन्द्रो महाबलः।

तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे! मा चल, मा चल।” अर्थात् रक्षा के जिस बंधन से राक्षस राज बलि को बाँधा गया था, उसी से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षा करने वाले सूत्र। तू भी अपने धर्म पर डटे रहना, उससे विचलित मत होना अर्थात् भली-भाँति रक्षा करना। स्पष्ट है कि रक्षाबंधन का मुख्य प्रयोजन और अर्थ रक्षा एवं भाई बहन के पक्के (पवित्र) रिश्ते से जुड़ा है। 

    अभिजीत आनंद
      लेखक/कवि
  महाविद्या द्वारा सम्मानित
    सह राष्ट्रीय खिलाड़ी
   

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